पत्रिका गेस्ट राइटर- शालीन, सौम्य व्यक्तित्व की धनी थीं 'दीदी सुषमा'

पत्रिका गेस्ट राइटर- शालीन, सौम्य व्यक्तित्व की धनी थीं 'दीदी सुषमा'

Atul Acharya | Publish: Aug, 08 2019 11:24:38 AM (IST) Bikaner, Bikaner, Rajasthan, India

सुषमा स्वराज ने 1997 में पहली बार बीकानेर में संस्कार भारती के कार्यक्रम में भाग लिया था। तब भारतीय संस्कृति पर दिए भाषण की पुराने कार्यकर्ता आज भी तारीफ करते हैं।

सुषमा स्वराज ने 1997 में पहली बार बीकानेर में संस्कार भारती के कार्यक्रम में भाग लिया था। तब भारतीय संस्कृति पर दिए भाषण की पुराने कार्यकर्ता आज भी तारीफ करते हैं। तब देशनोक में करणी माता के दर्शन करने के बाद सुषमा जी का महिला मोर्चा के साथ भोजन का आयोजन रखा गया। उन्होंने भोजन के साथ दिए बोतल बंद पेयजल पर कड़े शब्दों में कहा था कि विदेशी पेयजल को हाथ नहीं लगाती। स्वदेशी के प्रति उनका अटूट प्रेम झलका। फिर 2 दिसम्बर, 2018 को सुषमा स्वराज का विदेश मंत्री के रूप में बीकानेर आगमन हुआ। रवीन्द्र रंगमंच में उनके भाषण और पत्रकारों के तीखे सवालों का सकारात्मक एवं धैर्यपूण जवाब देना आज भी याद किया जाता है। उनके शालीन एवं सौम्य व्यक्तित्व से हर कोई प्रभावित हुआ।

 

2009 में संासद बनने पर सुषमा स्वराज से सांसद के रूप में रिश्ता जुड़ा। चुनाव के दौरान की एक शिकायत के सिलसिले में 20 मई, 2009 को सुषमाजी से उनके आवास पर मिला। तब उनके मुख से पहला वाक्य निकला 'अर्जुनजी वी डोन्ट लाइक ब्यूरोक्रेट्स।Ó यह सुनकर मैं कुछ प्रतिक्रिया देता, इससे पहले ही सुषमाजी ने कहा, मेरे कहने का अर्थ है कि ब्यूरोक्रेटिक अप्रोच को भाजपा में कम पसन्द किया जाता है। प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आपने जो ज्ञान अर्जित किया है, उसका लाभ पार्टी को मिले और सार्वजनिक जीवन के श्रेष्ठ जननेता के रूप में कार्य सम्पादित करेंगे तो पार्टी में आगे बढऩे के कई अवसर मिलेंगे।

 

ठीक एक साल बाद 16 मई, 2010 को सुषमा स्वराज से मिलने फिर उनके घर जाना हुआ। तब उन्होंने आत्मीयता से बात की। मैंने उनसे एक प्रश्न किया कि लोकसभा में कुछ लोग आपको दीदी और कुछ लोग मैडम कहते हैं। इसका क्या कारण है। उन्होंने जवाब दिया कि 'मैडमÓ तो लोग मुझे अपने आप कहते हैं और 'दीदीÓ कहने का अधिकार मैं स्वयं देती हूं। तब उन्होंने मुझे दीदी कहने का अधिकार देते हुए दो सलाह दी। एक तो गले को ठीक रखने की। संसदीय जीवन में ज्यादा बोलने का ही कार्य रहेगा और कार्यकर्ताओं से भी संवाद रहेगा। दूसरा नियमित 3 घण्टे पढऩे की।

 

पढऩे के लिए मार्गदर्शन दिया कि सुबह आधे घण्टे समाचार पत्र पढऩा, इसके बाद लोकसभा के बुलेटिन एवं कार्यावाली प्रपत्र से अभ्यास हो। आधे घण्टे डाक देखने का अभ्यास होना चाहिए, आधे घण्टे देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन और आधा घण्टा सोने से पहले धार्मिक पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए। शेष आधा घण्टा लाइब्रेरी में पढऩा चाहिए।

 

दीदी के मार्गदर्शन से ही 15वीं लोकसभा में सर्वाधिक लोकप्रिय सांसद का सम्मान मुझे मिल पाया। 6 अप्रेल, 2011 को दीदी ने जयपुर में भाजपा के स्थापना दिवस पर संबोधन में कहा कि अर्जुन मेघवाल बीकानेर से सांसद होने के साथ लोकसभा में मेरे संकटमोचक भी हैं। जब कोई भी व्यक्ति किसी बिल पर बोलने को तैयार नहीं होता तब अर्जुन मेघवाल बोलने को तैयार हो जाते हैं। इस तरह सुषमा दीदी से मेरा रिश्ता प्रगाढ़ होता गया। फिर एक बार खाटू श्यामजी और सालासर बालाजी के दर्शन कराने के लिए दीदी के साथ रहा। इस दौरान उनके आग्रह पर 'अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में..Ó सुनाया।

 

13 मई, 2012 को संसद के 60 वर्ष पूर्ण होने पर दीदी ने लोकसभा में ऐतिहासिक भाषण दिया। इसमें उन्होंने मेरा उल्लेख करते हुए कहा कि 'अध्यक्षजी 60 वर्षों में संसद भी बदली है और संसद में आने वाले लोग भी बदले हैं...। पहले राजा-महाराजाओं के अधिकारों को लेकर चर्चा होती थी, अब 15वीं लोकसभा में अर्जुन मेघवाल के ध्यानाकर्षण के माध्यम से सफाई कर्मचारियों के अधिकारों पर भी चर्चा होते देखी है।


ये कुछ ऐसी यादें हैं, जिनको याद करते हुए उनके विशाल व्यक्तित्व का चेहरा आंखों के सामने तैरने लगता है। वो एक श्रेष्ठ राजनेता, श्रेष्ठ सांसद के साथ श्रेष्ठ भारतीय नारी भी थी। दीदी नए सांसदों को तैयार करने वाली श्रेष्ठ कार्यकर्ता रहीं। भारतीय राजनीति का चमकता सितारा आज हमारे मध्य नहीं है। उनके विचार और सिद्धान्त मुझ जैसे सांसदों को प्रेरणा एवं मार्गदर्शन देते रहेंगे।

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