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बीकानेर

ख़ाकी को दागदार कर रहा बहानों का रंग

यह कुछ घटनाएं पुलिस की संजीदगी का स्तर जाहिर करती हैं। घर-दुकान में चोरी हो। मोबाइल लूट हो। बाइक चोरी की घटना हो। थानों तक पहुंचने वाले फरियादियों को पुलिस की बहानेबाजी का शिकार होना पड़ रहा है।

बीकानेरJun 25, 2024 / 09:28 am

Jai Prakash Gahlot

केस एक :- गंगाशहर थाना क्षेत्र निवासी राधेश्याम बाइक घर के सामने से चोरी हो गई। रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचा, तो उसे टरका दिया। जवाब मिला कि पहले बाइक एक-दो दिन तलाश कर लो, नहीं मिले तब रिपोर्ट दर्ज करवा देना। जबकि उसने सीसीटीवी फुटेज भी दिखाए, जिसमें युवक बाइक ले जाते हुए दिखाई दे रहा है।
केस दो :- पवनपुरी में एक घर में चोरी हुई। पुलिस ने मामला तक दर्ज नहीं किया। घटना के पांच-छह दिन बाद पीडि़त महिला कमला देवी पुलिस अधीक्षक से मिलीं, तब मामला दर्ज हुआ। मामला दर्ज होने के बाद पुलिस ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की। पीडि़ता भी अब न्याय की उम्मीद छोड़ चुकी है।
केस तीन :- सदर थाना इलाके में लूणकरनसर तहसील निवासी ओमप्रकाश का बाइक सवार नकाबपोश मोबाइल छीन ले गए। पुलिस आज तक मोबाइल स्नेचरों का पता नहीं लगा पाई। आरोपियों को पकड़ना तो दूर, परिवादी से कहा जा रहा है कि देर रात को सड़क पर मोबाइल से बात करना जरूरी थोड़े ही था।
केस चार :- करीब एक साल पहले लूणकरनसर थाना इलाके के मलकीसर के पास एक युवती का नहर में शव मिला। पुलिस ने शव को बाहर निकलवा कर नहर किनारे ही दफना दिया। मामले की उच्चाधिकारियों को सूचना नहीं दी। मामला तूल पकड़ गया। तब पुलिस अधीक्षक ने सख्ती करते हुए एसएचओ, एक हवलदार व एक सिपाही को लाइन हाजिर किया।
जयप्रकाश गहलोत / बीकानेर. यह कुछ घटनाएं पुलिस की संजीदगी का स्तर जाहिर करती हैं। घर-दुकान में चोरी हो। मोबाइल लूट हो। बाइक चोरी की घटना हो। थानों तक पहुंचने वाले फरियादियों को पुलिस की बहानेबाजी का शिकार होना पड़ रहा है। जवाब भी अजीबो-गरीब मिल रहे हैं। मसलन पहले खुद तलाश कर लो, फिर आना। रात में सड़क पर मोबाइल से बात करते हुए जाना जरूरी था क्या? यह हालात तब हैं, जब ऐसे ही लापरवाही के एक मामले में पुलिस अधीक्षक ने करीब साल भर पहले एक एसएचओ, हवलदार और सिपाही को लाइन हाजिर भी किया था। बाद में भी कुछ और मामलों में कार्रवाई हुई, लेकिन थाना स्तर पर फरियादियों को टरकाने का पुराना रवैया थमा नहीं है।

शिथिलन का यह आलम

पुलिस की सुस्ती और टरकाने की हद यह है कि हादसे व वारदात की सूचना उच्चाधिकारियों तक नहीं दी जा रही है। सूचना संग्रहण कर आगे भेजने के लिए संचालित अभय कमांड एवं पुलिस कंट्रोल रूम को भी नहीं बताया जा रहा। वारदात होने के आधा-पौन घंटे तक वहां संबंधित थाने की ओर से संदेश नहीं भेजा जाता है। बाइक चोरी, घर-दुकान में छिटपुट चोरी की वारदात दर्ज करने में तो पुलिस का टालू रवैया जगजाहिर हो चुका है।

एक कारण यह भी…

जिला पुलिस के अनुसार इस साल पांच माह में ही चार हजार से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं, जबकि अभी सिर्फ साढ़े पांच महीने ही निकले हैं। आशंका है कि इस साल मामले नौ हजार के पार जा सकते हैं। शायद यही वजह है कि 10 से 15 फीसदी मामले पुलिस दर्ज ही नहीं कर रही है। हालात यह हैं कि चोरी के कई मामले पुलिस आरोपियों को पकड़ने के बाद दर्ज करती है। पिछले दिनों नयाशहर, नापासर, नोखा, गजनेर और नाल थाने से जुड़े मामलों में कुछ ऐसा ही हुआ।

घालमेल तो है

पुलिस चोरी के मामले में गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ करती है। आरोपियों के कई वारदातें कबूलने की जानकारी दी जाती है, लेकिन यह हकीकत से कोसों दूर है। पुलिस आरोपियों को पकड़ती जरूर है, लेकिन बरामदगी 50 फीसदी भी नहीं होती। पुलिस जितनी बरामदगी बताती है, उतनी एफआईआर भी दर्ज नहीं होती है। इससे स्पष्ट है कि घालमेल तो है।
ओमप्रकाश जोशी, सेवानिवृत आरपीएस एवं वरिष्ठ अधिवक्ता

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