एक परिवार की दर्दभरी कहानी जिसे सुनकर आपकी भी आंखें हो जाएगी नम

बचपन से सुनने में दिक्कत, फिर मानसिक बीमारी के कारण जिन्दगी आज घर और बेडिय़ों में बंद रहने तक रह गई है।

By: dinesh swami

Published: 11 Sep 2017, 12:43 PM IST

बीकानेर. बचपन से सुनने में दिक्कत, फिर मानसिक बीमारी के कारण शोभासर निवासी भंवर की जिन्दगी आज घर और बेडिय़ों में बंद रहने तक रह गई है। घर के एक कोने में भंवर को बार-बार जंजीर से बांध कर कैद रखना आर्थिक रूप से कमजोर इसके परिवार की मज*****ी बन गई है।

 

लकवे की बीमारी से जूझ रहा भंवर के पिता दुलाराम अपने पुत्र को जंजीर में बंधे देखने के सिवाय कुछ नहीं कर पा रहे हैं। वे चाह कर भी बेटे का इलाज नहीं करवा पा रहे। भंवर की मां मजदूरी कर किसी तरह परिवार का भरण-पोषण कर रही है। गरीबी और बीमारी से जूझ रहे इस परिवार को सरकारी मदद का इंतजार है।

 

बात-बात में दुलाराम की आंखों से छलक रहे आंसू और लकवे के कारण कमजोर शारीरिक और आर्थिक स्थिति चाह कर भी भंवर का उचित उपचार नहीं करवा पा रहे है। भंवर की मां मजदूरी कर किसी प्रकार परिवार का भरण पोषण कर रही है। गरीबी और बीमारी से जूझ रहे इस परिवार को सरकारी मदद का इंतजार है।

 

हरसंभव किए प्रयास
बात-बात में दुलाराम की आंखों से आंखों से आंसू छलक आते हैं। कमजोर शारीरिक और आर्थिक स्थिति से जूझ रहे दुलाराम ने बताया कि भंवर को ठीक कराने के हर संभव प्रयास किए, पूरे एवं उचित उपचार के अभाव में उसकी स्थिति जस की तस है। पीबीएम में दिखाया, दवाइयां दिलवाई।

 

कुछ दिन वह ठीक रहता और फिर अचानक उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। मारपीट करता है, चिल्लाना व पत्थर फेंकना शुरू कर देता है। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगती है, तो उसे जंजीर से बांधना पड़ता है। दुलाराम ने कहा कि कुछ लोगों ने जयपुर में इलाज कराने की सलाह दी, लेकिन बिना पैसे वहां इलाज करवाना संभव नहीं है।

 

नहीं मिली मदद
भंवर को ठीक कराने के लिए हरसंभव प्रयास किए। हॉस्पिटल में इलाज भी करवाया। यह कुछ दिन ठीक रहता है, फिर उसकी स्थिति बिगड़ जाती है। उसे बार-बार बांध कर रखना पड़ता है। पिछले दस वर्षों से अधिक समय से यही स्थिति है। भंवर के इलाज को मदद के लिए हर किसी से गुहार लगाई है, लेकिन कोई मदद नहीं मिली।
गोपाल मेघवाल, भंवर का भाई, शोभासर निवासी

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