टिड्डयों के भार से ही टूट जाते हैं पेड़

टिड्डयों के भार से ही टूट जाते हैं पेड़

Jitendra Goswami | Updated: 14 Jun 2019, 04:14:12 PM (IST) Bikaner, Bikaner, Rajasthan, India

टिड्डियां पत्ते, फूल, फल बीजए तने और उगते हुए पौधों को खाकर नुकसान पहुंचाती तो है ही और जब ये समूह में पेड़ों पर बैठती हैं तो इनके भार से पेड़ तक टूट जाते हैं।

बीकानेर. आजकल राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्र जैसलमेर, बाड़मेर जिलों में टिड्डी दल डेरा डाले हुए है। इसका खतरा जोधपुर एवं बीकानेर पर भी मंडरा रहा है। टिड्डी दल का नाम आते ही शरीर में सिरहन सी दौड़ जाती है। ऐतिहासिक रूप से रेगिस्तानी टिड्डी हमेशा से ही मानव कल्याण की दृष्टि से बड़ा खतरा रही है। विश्व के दो प्रमुख ग्रंथों जैसे कि बाइबल और कुरआन में रेगिस्तानी टिड्डी को मनुष्यो के लिए अभिशाप के रूप में माना गया है। टिड्डी द्वारा की गई क्षति का दायरा इतना बड़ा है जोकि कल्पना से भी परे है।

 

 

 

इनके भार से पेड़ तक टूट जाते हैं

 

 

जहां भी ठहरता है वहां खेतों एवं पौड़ पौधों को पूरी तरह से खा जाता है। क्योंकि इनकी बहुत अधिक खाने की क्षमता के कारण भुखमरी तक की स्थिति उत्पनन्न हो जाती है। औसत रूप से एक छोटा टिड्डी का झुंड एक दिन में इतना खाना खा जाता है जितना दस हाथी या 25 ऊंट या 2500 व्यक्ति खा सकते हैं। टिड्डियां पत्ते, फूल, फल बीजए तने और उगते हुए पौधों को खाकर नुकसान पहुंचाती तो है ही और जब ये समूह में पेड़ों पर बैठती हैं तो इनके भार से पेड़ तक टूट जाते हैं।

 

 

 

 

टिड्डी के प्रकोप से प्रभावित क्षेत्र

 

 

रेगिस्तानी टिड्डी के प्रकोप से प्रभावित क्षेत्र लगभग 30 मिलियन वर्ग किलोमीटर है जिसमें लगभग 64 देशों का सम्पू्र्ण भाग या उनके कुछ भाग शामिल हैं। इनमें उत्तर पश्चिमी और पूर्वी अफ्रीकन देश, अरेबियन पेनिनसुला दक्षिणी रूस गणराज्य, ईरान अफगानिस्तान और भारतीय उप.महाद्वीप के देश शामिल हैं।

 

 

टिड्डी प्रकोपमुक्त अवधि के दौरान जब टिड्डियां कम संख्या में होती हैं तब ये शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्र के बड़े भागों में पाई जाती हैं जोकि बाद में अटलांटिक सागर से उत्तर.पश्चिम भारत तक फैल जाती हैं। इस प्रकार ये 30 देशों में लगभग 16 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पाई जाती हैं।

 

 

 

टिड्डियों के जनन का मौसम

 

 

 

टिड्डियों के लिए तीन प्रजनन सीजन होते हैं शीतकालीन प्रजनन नवंबर से दिसंबर,वसंत प्रजनन जनवरी से जून, और ग्रीष्मकालीन प्रजनन जुलाई से अक्टूबर तक रहता है। भारत में केवल एक टिड्डी प्रजनन का मौसम है और वह है ग्रीष्मकालीन प्रजनन। पड़ोसी देश पाकिस्तान में स्प्रिंग और समर ब्रीडिंग दोनों हैं।

 

 

इनमें माध्यम से होता है यहां नियंत्रण

 

 

भारत में टिड्डी नियंत्रण और अनुसंधान नियंत्रण रेखा और आर योजना डेजर्ट टिड्डी के नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। इसे संगठन के माध्यम से कार्यान्वित किया जा रहा है जिसे 1939 में स्थापित ष्टिड्डी चेतावनी संगठन के रूप में जाना जाता है। बाद में संयंत्र संरक्षण संगरोध और भंडारण निदेशालय के साथ समामेलित किया गया।

 

 

टिड्डे वार्निंग ऑर्गनाइजेशन मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात राज्यों में आंशिक रूप से अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्र में टिड्डी स्थिति की निगरानी और नियंत्रण करने के लिए जिम्मेदार है। जबकि आंशिक रूप से पंजाब और हरियाणा राज्यों में गहन सर्वेक्षण निगरानी के माध्यम से नियंत्रण संचालन होता है ।

 

 

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