कोलकाता के बाद यहां का दुर्गोत्सव है खास, बेटी के रूप में पूजी जाती हैं मां अम्बे

कोलकाता के बाद यदि दुर्गोत्सव के लिए कोई जगह सबसे खास मानी जाती है, तो वह है बिलासपुर। यहां 92 वर्ष पहले बंगाली एसोसिएशन ने रेलवे क्षेत्र में पहली बार दुर्गोत्सव मनाकर इसकी शुरुआत की थी।

बिलासपुर. कोलकाता के बाद यदि दुर्गोत्सव के लिए कोई जगह सबसे खास मानी जाती है, तो वह है बिलासपुर। यहां 92 वर्ष पहले बंगाली एसोसिएशन ने रेलवे क्षेत्र में पहली बार दुर्गोत्सव मनाकर इसकी शुरुआत की थी। वहीं से ही शहर में कोलकाता के दुर्गोत्सव की संस्कृति देखने को मिली।

आज शहर कोलकाता की तर्ज पर ही दुर्गोत्सव मनाने के लिए प्रसिद्ध है। लोगों को हर साल दुर्गोत्सव का इंतजार रहता है। मिनी कोलकाता की तरह यहां पर भव्य रूप से दुर्गोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इसका श्रेय बंगाली समाज को ही जाता है। इस संस्कृति व सभ्यता को अब सिर्फ बंगाली समाज ही नहीं बल्कि सभी समाज के लोग उत्साह व उमंग से अपनाकर भव्य रूप से मनाते हैं।

बंगाली एसोसिएशन ने पहली बार रेलवे क्षेत्र में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करते हुए दुर्गा पूजा का स्वरूप लोगों को दिखाया था। तब से आज तक कोलकाता की तरह ही पारंपरिक पूजा रेलवे बंगाली स्कूल मैदान में की  जाती है। बंगाली एसोसिएशन के सुजीत रॉय ने बताया मां दुर्गा बेटी की तरह पूजी जाती है।

दुर्गोत्सव में वह अपने मायके आती है। इसी परंपरा को बनाए रखने के लिए रेलवे क्षेत्र में ही सबसे पहली बार दुर्गा मां की प्रतिमा स्थापित की गई थी। कई साल तक लोग यहां मां की आराधना के लिए एक साथ इक्ट्ठा होते थे। सभी सामूहिक रूप से पूजन करते थे। धीरे-धीरे शहर के लोगों ने पूजन को बढ़ावा देते हुए कोलकाता की संस्कृति को अपनाकर पूजा शुरू की। आज शहर में हर जगह पर बंगाली परंपरा से ही मां दुर्गा की पूजा की जा रही है। सभी उत्साह व उमंग के साथ मां शक्ति की आराधना में लीन होते हैं।

1952 में पहली बार स्थापित की दुर्गा
बंगाली एसोसिएशन के सदस्यों ने बताया कि शहर में रेल लाइन बनने के साथ ही अंग्रेजों ने शहर में प्रवेश किया। रेल लाइन के बाद ही रेलवे अधिकारी व कर्मचारियों के रूप में कोलकाता से लोग आए। अपनी सभ्यता व संस्कृति में दुर्गा पूजा का आयोजन 1952 में पहली बार करते हुए इस परंपरा को शुरू किया। प्रारंभ में चुचुहियापारा, रेलवे स्कूल  में रेलवे के पोल, स्लीपर व अन्य लोहे के सामग्री का इस्तेमाल करते हुए ही पंडाल बनाया गया था।

25 सालों तक कोलकाता से लाई गई प्रतिमा
मां दुर्गा की प्रतिमा कोलकाता में गंगा की मिट्टी से तैयार करने की परंपरा रही है और कोलकाता में कुमारटुली क्षेत्र मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है और पूजा के लिए प्रारंभ में 25 साल तक मां दुर्गा की प्रतिमा मालगाड़ी से लाई जाती थी। साथ ही पूजा का हर एक सामान भी कोलकाता से ही लाया जाता था फिर धीरे-धीरे उडि़सा व पश्चिम बंगाल  के कुछ मूर्तिकार यहां आए और उन्होंने मूर्ति बनाने की शुरुआत यहां की।
(काजल किरण कश्यप)

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सूरज राजपूत Desk/Reporting
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