आसमान से उतरीं थी मां जगदम्बे, हेलीकॉप्टर से लाई गई थी प्रतिमा

दुर्गोत्सव की शुरुआत रेलवे क्षेत्र से हुई थी।शहर की आरटीएस कॉलोनी में भी दुर्गा पूजा के लिए पहली बार हेलीकॉप्टर से मां दुर्गा की प्रतिमा व फूल लाए गए थे।

By: सूरज राजपूत

Published: 19 Oct 2015, 12:22 PM IST

बिलासपुर. दुर्गोत्सव की शुरुआत रेलवे क्षेत्र से हुई थी। जब इस पूजा की शुरुआत शहर में हुई तब यहां पर हर चीज कोलकाता से लानी पड़ती थी।

शहर की आरटीएस कॉलोनी में भी दुर्गा पूजा के लिए पहली बार हेलीकॉप्टर से मां दुर्गा की प्रतिमा व फूल लाए गए थे। आज शहर में कोलकाता के ही लोग आकर दुर्गा मां की प्रतिमा से लेकर हर एक चीज तैयार कर शहरवासियों को उपलब्ध करा रहे हैं। आरटीएस कॉलोनी में 71 वर्षों से इस पूजा को बंगाली परंपरा के मुताबिक किया जा रहा है।

रेलवे क्षेत्र में बंगाल से आए कुछ कर्मचारियों ने दुर्गा पूजा की शुरुआत कर इसे भव्य रूप प्रदान किया है। आरटीएस कॉलोनी बांधव समिति के सचिव इंद्रजीत विश्वास ने बताया कि जब यहां पर पूजा की शुरुआत हुई तो कुछ लोग ही शामिल थे।  बंगाली स्कूल में पहली बार पूजा शुरू की गई।

उसके बाद आरटीएस कॉलोनी में भी पूजा की जाने लगी और तब कर्नल मुखर्जी ने इस पूजा में विशेष सहयोग किया था। मूर्तियां यहां उपलब्ध नहीं होती थीं तब उन्होंने हेलीकॉप्टर से कोलकाता से मां दुर्गा की प्रतिमा मंगाई थी और ऐसा कई वर्षों तक चलता रहा। उसके बाद यहां पर मूर्तिकार आकर रहने लगे और अब वे ही दुर्गा पूजा के लिए खास तौर पर बंगाली पैटर्न की मूर्ति बना रहे हैं।

ऐसे हुई शुरुआत
रेलवे क्षेत्र में बंगाली एसोसिएशन की ओर से एक ही जगह दुर्गा पूजा की जाती थी। आरटीएस कॉलोनी में भी बंगाली अधिक संख्या में थे। तब यहां से सभी पूजा देखने जाते थे। अधिक भीड़ होती थी।

यहां के बंगाली अधिकारियों ने अलग से पूजा करने का निर्णय लिया और कर्नल मुखर्जी के सहयोग से यह पूजा शुरू हुई। तब से लेकर आज तक यह परंपरा यहां जीवित है। यहां हजारों लोग नवरात्र में दर्शन करने जाते हैं।

35 साल से एक ही व्यक्ति बजा रहा ढाक
आरटीएस कॉलोनी में बंगाली पैटर्न में पूजा होती है। आज भी वह परंपरा बनी हुई हैं।  इस पूजा में बंगाली वाद्ययंत्र ढाक का विशेष महत्व होता है। यहां पर कोलकाता से ढाक बजाने वाले कलाकार को बुलाया जाता है। इस पंडाल में बंगाल के मिदनापुर जिले  से लगातार 35 वर्षों से ढाक बजाने वाले मदन मंडल आते हैं। जब उन्होंने यहां आना शुरू किया था। तब वे युवा थे और आज उनकी उम्र 55 वर्ष से अधिक हो गई है। मदन मंडल खास तौर पर ढाक बजाने के लिए ही यहां आते हैं।
बुजुर्ग सदस्य भी करते हैं माता की सेवा
समिति के युवा सदस्य तो सक्रिय हैं। साथ ही इस समिति में बुजुर्ग सदस्य भी हैं। जो लगातार कई वर्षों से माता की सेवा कर रहे हैं। 80 वर्षीय गीता विश्वास 50 सालों से पूजा में सहयोग करती हैं।

इसी तरह 65 वर्ष के डिलू डे भी 40 सालों से पूजा में सक्रिय होकर सहभागिता निभा रहे हैं। इनके अलावा व्ही रामाराव, डी विश्वास, शिशिर कुमार, अजय चंदेल, पीवी राव, अरनब गोस्वामी, चरनजीत सिंह, प्रानब चक्रवर्ती, प्रवीण कान्हा, पी दत्ताचार्य, पी संतोष राव, इंद्रजीत विश्वास के साथ समिति के सभी सदस्यों का विशेष सहयोग है।

बंगाली विधि है आकर्षण का केन्द्र
बंगाल की तर्ज पर पांच दिनों तक मां दुर्गा को बेटी की तरह पूजते हुए सेवा-सत्कार किया जाता है। आरटीएस कॉलोनी बंगाली संस्कृति के मुताबिक पूजा करती आ रही हैं। इसी वजह से आज भी यहां पर लोग बंगाली संस्कृति को देखने के लिए आते हैं। पूजा के पंडाल से लेकर मां दुर्गा की प्रतिमा बंगाली पैटर्न को प्रदर्शित करती हैं। यही इसकी खास बात है।
(काजल किरण कश्यप)
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सूरज राजपूत Desk/Reporting
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