गांधी की मध्यस्थता वाली राह बेहतर, इसी से कम होंगे लंबित प्रकरण

जहां तक मेरी भूमिका का सवाल है तो संवैधानिक दायरे में रहकर कैसे इन मामलों की संख्या घटाई जाए।

By: Amil Shrivas

Published: 03 Jan 2019, 03:13 PM IST

बिलासपुर. महात्मा गांधी ने जिस तरह 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी की शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका जैसे देश में मध्यस्थता की राह अपना कर कई मामलों को अदालत के बाहर हल करने का अनोखा रास्ता अख्तियार किया था। अगर इसी मार्ग का अनुसरण आज के दौर के अधिवक्ता करें, तभी अदालतों में लंबित मामलों की संख्या में कमी आएगी। अन्यथा न्याय पाने की लंबी ज²ोजहद से आम आदमी को इसी तरह गुजरना पड़ेगा।

देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या इसी तरह हजारों और लाखों के पार होते जाएगी और न्याय की आस धूमिल होती जाएगी। वैसे कहा भी गया है जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड। पत्रकारों से चर्चा करते हुए राज्य के शासकीय महाधिवक्ता कनक तिवारी ने ये बातें कही। बुधवार को हाईकोर्ट स्थित महाधिवक्ता कार्यालय में चर्चा के दौरान उन्होंने शासकीय महाधिवक्ता की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी प्राथमिकता में राज्य और हाईकोर्ट के बीच एक बेहतर सामंजस्य स्थापित करना प्रमुख होगा। ताकि शासन का पक्ष हाईकोर्ट के समक्ष बेहतर तरीके से रखा जा सके, जिससे न्याय की अवधारणा भी सुरक्षित रहे और आम आदमी को त्वरित न्याय मिल सके। वैसे जहां तक हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या का सवाल है तो 80 प्रतिशत मामले शासन के ही होते हैं या तो पक्ष के या विपक्ष के। जहां तक मेरी भूमिका का सवाल है तो संवैधानिक दायरे में रहकर कैसे इन मामलों की संख्या घटाई जाए।

इसका प्रयास प्रमुख रुप से करुंगा। गरीब और लाचार जो हाईकोर्ट की सीढिय़ां तो जैसे-तैसे चढ़ जाता है पर न्याय की आस में जिस लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, उसे मदद करने के लिए महाधिवक्ता कार्यालय हमेशा तैयार है। अधिवक्ताओं से अपील करुंगा कि मामलों का निपटारा जहां तक हो सके, मध्यस्थता से हल करने की कोशिश करें।
जनहित याचिकाओं का करेंगे अवलोकन : आए दिन किसी भी बात को लेकर जनहित याचिका दायर करने का जो चलन इन दिनों फैशन में है। इसे लेकर एक योजना उनके जेहन में है। रजिस्ट्री कार्यालय को इस संबंध में आज ही निर्देश जारी किया जाएगा कि दायर होने वाली सभी जनहित याचिकाओं को अवलोकन के लिए उनके समक्ष रखा जाए। जो याचिकाएं सुनवाई योग्य हों या जिससे आम आदमी का हित जुडा़ हो उसे ही सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के समक्ष रखा जाए। ताकि अदालत का कीमती वक्त जाया ना हो। हाईकोर्ट का समय कीमती है, इसका सही परिप्रेक्ष्य में इस्तेमाल लंबित मामलों की संख्या में कमी लाएगा और सही व्यक्ति को न्याय समय पर मिल सकेगा।

विधानसभा को संबोधित करने का अधिकार : महाधिवक्ता की भूमिका को स्पष्ट करते हुए तिवारी ने कहा कि संविधान ने महाधिवक्ता के दायरे में विधानसभा को संबोधित करने का भी अधिकार दिया है। ये अलग बात है कि ये चलन में नहीं है और अधिकांश इससे परहेज करते हैं। लेकिन आवश्यकता पडी तो इस अधिकार का उपयोग संवैधानिक दायरे में रहकर अवश्य करुंगा। वैसे महाधिवक्ता की भूमिका शासन को ना सिर्फ नीतिगत सलाह देने की है, बल्कि शासन की नीतियों में अगर कहीं चूक हो रही है तो सावधान करने की है। ताकि अदालत में किसी प्रकार की असहज स्थिति का सामना नहीं करना पड़े।
शासन के हित से सर्वोपरि लोकहित : चर्चा के दौरान महाधिवक्ता तिवारी से जब इस संबंध में पूछा गया कि अक्सर शासकीय महाधिवक्ता की भूमिका शासन के हितों के इर्द-गिर्द रहती है। इसमें आम आदमी के हितों की अक्सर अनदेखी होती है। क्योंकि अधिकांश मामलों में तो वादी या परिवादी की भूमिका में सरकार ही रहती है। इन परिस्थितियों में किसके पक्ष को प्रमुखता से रखेंगे। क्योंकि आपकी नियुक्ति तो शासन की ओर से की गई है। इस पर तिवारी ने स्पष्ट किया कि कामन मैन का हित सर्वोपरि रहेगा। वैसे शासन आम आदनी के खिलाफ होता भी नहीं है। प्रत्यक्ष रुप से बागडोर तो आम आदमी के चयनित प्रतिनिधियों की होती है। लेकिन अगर चयन की स्थिति आई कामन मैन फस्र्ट।

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