पहले पैरासिटामोल का ओवर डोज देकर चूहे का लिवर खराब किया, इसके बाद इमली के पत्ते और पलाश से उसे ठीक किया

केंवची, पेंड्रा व खोर्री आदि जनजातीय क्षेत्रों में कैसे होता है लिवर का इलाज इस पर किया गया है यह अध्ययन

बिलासपुर। गुरू घासीदास विश्वविद्यालय (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) की प्राकृतिक संसाधन विद्यापीठ के अंतर्गत फार्मेसी विभाग में यकृत संबंधी बीमारियों में औषधीय पौधों के उपयोग पर शोध किया गया है। इस विषय का अध्ययन डॉ. प्रदीप कुमार सामल, सहायक प्राध्यापक, फार्मेसी विभाग ने किया है। उनके शोध निर्देशक प्रो. जे. एस. दांगी, तत्कालीन प्राध्यापक, फार्मेसी विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय है। डॉ. सामल को दिसंबर, 2012 में पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई।

उक्त शोध का विषय ''इथनोफार्मिकोलॉजिकल स्टडीज ऑफ हेपर्टोप्रोटेक्टिव मेडिसनल प्लांट्स'' है। शोध अध्ययन के अनुसार जनजातीय क्षेत्रों में यकृत से संबंधित बीमारियों के इलाज में औषधीय पौधों का उपयोग किया जाता है। यकृत से संबंधित प्रमुख बीमारियों में पीलिया, भूख न लगना एवं हेपेटाइटिस आदि है।
शोध से प्राप्त निष्कर्षष के अनुसार इमली का पत्ता (टामरेंड्स इंडिया), अष्यूटिलम इंडिकम पलाश के पौधे को सक्रिय तत्वों का निष्कर्षण कर चूहों को पैरासिटामॉल की अधिक खुराक देकर उनका यकृत खराब किया गया। चूहों में यकृत संबंधी परेशी आने पर औषधीय पौधों के निष्कर्ष का प्रयोग किया गया है। अध्ययन में पाया गया कि औषधीय पौधों का निष्कर्षण चूहों के यकृत को हानिकारक प्रभाव से बचाता है। शोधार्थी ने केंवची, पेंड्रा व खोर्री आदि जनजातीय क्षेत्रों में जाकर औषधीय पौधों का संग्रहण किया।

JYANT KUMAR SINGH
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