28 साल बाद मिला न्याय, माथे से कलंक भी हटा लेकिन खुशी मनाने के लिए फरियादी जिंदा नहीं है

High Court acquits: जिला सहकारी बैंक का मृत कर्मचारी 28 साल बाद हुआ दोषमुक्त

By: Murari Soni

Published: 06 Jul 2019, 12:20 PM IST

बिलासपुर. हाईकोर्ट ने जिला सहकारी बैंक के मृत कर्मचारी को 28 वर्षों बाद आरोपों से बरी(High Court acquits) करते हुई दोषमुक्त करार दिया व बैंक को 1991 से लंबित समस्त भुगतान किए जाने का आदेश जारी किया है। परिजनों द्वारा 20 वर्षों तक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जस्टिस पी सैम कोशी की एकलपीठ ने अपना फैसला सुनाया है। एकलपीठ के फैसले से मृत बैंककर्मी के परिजनों को बड़ी राहत मिली है।

ज्ञात हो कि बिलासपुर जिला सहकारी बैंक में अच्छे लाल दुबे कैशियर के पद पर पदस्थ थे। बैंकिंग लेन-देन संबंधी कुछ गलतियां होने पर विभाग द्वारा 1991 में चार्जशीट दिया गया और सुनवाई का मौका दिए बगैर एकतरफा कार्रवाई करते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ दुबे ने बोर्ड आफ रेवेन्यू समेत अन्य फोरम में शिकायत दर्ज कराई।

इसमे कहा गया कि बैंक द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश में बैंकिंग सेवा नियमों का पालन नहीं किया गया। उन्हें ना ही जांच के दस्तावेज उपलब्ध कराए गए और ना ही गवाहों की लिस्ट ही दी गई, ताकि अपना बचाव कर सकें। एकतरफा कार्रवाई कर बर्खास्त कर दिया गया। ये बैंकिंग सेवौ नियमों के विपरित है, आदेश वापस लिया जाए। दुबे के उक्त आवेदन के बाद भी रेवेन्यू एवं अन्य विभागों द्वारा किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं की गई।

अपनी अपील खारिज हो जाने के बाद अच्छे लाल दुबे ने 1999 में हाईकोर्ट में याचिका लगाई। मामले की सुनवाई के दौरान ही उनकी मौत हो गई, फिर भी परिजनों ने न्याय की जंग जारी रखी। आखिरकार जस्टिस पी सैम कोशी की एकलपीठ ने 28 साल पुराने मामले में याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि जिला सहकारी बैंक द्वारा बैंकिग सेवा नियमों का पालन नहींं किया गया।

याचिकाकर्ता को सुनवाई का मौका दिए बगैर एकतरफा कार्रवाई कर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। लिहाजा याचिकाकर्ता 1991 से अपने समस्त भुगतान का हकदार है। याचिकाकर्ता की मृत्यू हो जाने के कारण राशि उसके परिजनों को दी जाए।

 

हाईकोर्ट और प्रदेश के विभिन्न न्यायालयों में 3 लाख 10 हजार से अधिक मामले लंबित
हाईकोर्ट व प्रदेश के विभिन्न न्यायालयों में 3 लाख 10 हजार से अधिक मामले सुनवाई के लिए लंबित है। हाईकोर्ट में ही लंबित मामलों की संख्या 65 हजार से अधिक है। वहीं प्रदेश की विभिन्न अदालतों का आंकड़ा 2 लाख 50 हजार से अधिक है। अगर देश का आंकड़ा लें तो इसकी संख्या 3 करोड़ 50 लाख से अधिक है। हालांकि इन लंबित मामलों के निपटारे के लिए हर स्तर पर प्रयास जारी है।

लेकिन जजों की कमी, पर्याप्त संख्या में अदालतों का नहीं होना भी प्रमुख कारण है। राज्य विधिक प्राधिकरण द्वारा लोक अदालतों व नेशनल लोक अदालतों का आयोजन कर इसकी संख्या में कमी लाने की कोशिश की जा रही है। इस वर्ष 5 हजार से अधिक मामले निपटाए गए। अप्रैल 2019 में ही चेक बाउंस के 1382 प्रकरण निपटाए गए। लेकिन ये नाकाफी है।

एक सर्वेक्षण कंपनी की रिपोर्ट के अनुसार अब तक के लंबित मामलों के निराकरण में ही 435 वर्ष लगेगें। इन वर्षों में जो मामले लाए जाएंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका निराकरण कब तक हो सकेगा।

 

जजों की संख्या महज 15
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में फिलहाल 15 जजों की पदस्थापना की गई है, जबकि 22 जजों की नियुक्ति का प्रावधान है। इस लिहाज से एक तिहाई जजों की कमी है। वहीं प्रदेश के विभिन्न न्यायालयों पेंडिग केसों के अनुपात में जजों की संख्या काफी कम है।


अधिवक्ता ही सिर्फ जिम्मेदार नहीं
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सीके केशरवानी ने कहा कि लंबित मामलों के निराकरण के लिए सिर्फ अधिवक्ताओं को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए जजों की कमी के साथ पर्याप्त संख्या में अदालतों का नहीं होना भी है।


केस डायरी देने में पुलिस करती है देर
बार एसोसिएशन के सचिव अब्दुल वहाब खान ने बताया कि अधिकांश मामलों में पुलिस द्वारा केस डायरी देने में विलंब के कारण भी प्रकरण की सुनवाई टाली जाती है। व्यवस्था होना चाहिए कि पुलिस केस डायरी देने में विलंब ना करे।


मध्यस्थ अदालतों की भूमिका
अधिवक्ता सलीम काजी का कहना है कि पेडेंसी कम करने के लिए मध्यस्थ अदालतों की भूमिका महत्वर्पूण है। इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है। आने वाले दिनों में इससे मामलों की संख्या घटाने में मदद मिलेगी।


राजस्व न्यायालय- यहां भी असान नहीं काम, फरियादियों की घिस रहीं हैं चप्पलें
राजस्व विभाग में भी 4 हजार से ज्यादा मामले लटके
अधिकांश सीमांकन, बटांकन, नामांतरण के
सबसे ज्यादा तहसीलदार न्यायालय बिल्हा- 474
इसके बाद तहसीलदार न्यायालय बिलासपुर- 308
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फरियादियों का तेल निकालने में जिले का राजस्व अमला भी पीछे नहीं है। पूरे जिले में चार हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। हैरानी तब होती है जब ये मामले सीमांकन, बटांकन और नामांतरण के होते हैं। पूरे जिले में बिल्हा तहसील न्यायालय में सबसे ज्यादा 474 मामले पेंडिंग हैं तो दूसरे नंबर पर बिलासपुर तहसील न्यायालय है। यहां 308 मामले पेंडिंग हैं। वहीं कलेक्टर न्यायालय की बात करें तो यहां पेंडिंग की संख्या कम है कुल पेंडिंग 72 है लेकिन नौ से 12 माह के दो मामले, एक से दो साल के 40 मामले और दो से पांच वर्ष के 26 मामले जबकि पांच वर्ष से ज्यादा के चार मामले यहां पेंडिंग हैं। जिले में नायब तहसीलदार के न्यायालय से लेकर कलेक्टर तक के न्यायाल की बात करें तो राजस्व संबंधी कुल 38 न्यायालय हैं। यहां अभी तक की स्थिति में चार हजार 76 मामले पेंडिंग हैं।

 

ऐसे आसान हो सकती है कोर्ट और फरियादी दोनों की राह
इस मामले में सात अप्रैल 2013 को दिल्ली में आयोजित मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में वर्तमान पीएम व तात्कालीन सीएम मोदी ने पेंडेंसी कम करने के लोकर कई अहम सुझाव दिए थे। जिसे उन्होंने गुजरात में अपनाया था। गुजरात का पैटर्न आसानी से अपनाया जा सकता है। उस दौरान मोदी ने अपने भाषण में शामिल किया कि कैसे वहां पर सरकार औरर कोर्ट ने मिलकर पेंडेंसी को घटाने के लिए प्रयास किए। ये बात सही है कि पूरी व्यवस्था अचानक नहीं बदली जा सकती है। पर कुछ चीजें हैं वर्तमान व्यवस्था के तहत ही बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

इवनिंग कोर्ट-
पीएम मोदी ने कहा था कि उन्होंने गुजरात में कोर्ट से अनुरोध किया कि इवनिंग कोर्ट लगाया जाए ताकि जो गरीब तबके के लोग हैं वो अपने काम-धाम निपटा कर आसानी से कोर्ट में उपस्थित हो सकें। इससे उनकी एक दिन की रोजी रोटी बच जाएगी। 2006 में इसकी शुरुआत की गई।

छुट्टियों को किया जाए कम
गुजरात मामले में सरकार ने कोर्ट से इस बात का अनुरोध किया कि क्या कोर्ट की छुट्टियां कम की जा सकती हैं। यदि इस दिशा में कुछ भी संभावना है तो ये पेंडेंसी के मामले में बेहतर परिणाम देगा। इस दिशा में काम भी हुआ परिणाम भी सुखद आया। केवल पांच दिन छुट्टियों में काम करें और प्रतिदिन प्रति जज दस छोटी ही मामले सही पर निपटाएं।

बनें टेक सेवी
इस बात की भी चर्चा की गई है कि बार, बेंच और कोर्ट को टेकसेवी बनाया जाए उनके कार्यों में डिजीटल वर्किंग को शामिल किया जाए। इसके अलावा कोर्ट को एक बुलेटन निकालना चाहिए जिसमें सबसे पुराने पेंडिंग केस को हाईलाइट किया जाए। इससे लोगों के बीच पेंडेंसी को लेकर एक संवेदनशीलता की स्थिति बनेगी।

ग्राम न्यायालयों की स्थापना
इस दिशा में भी गुजरात में काम करने के लिए अनुरोध किया गया। साथ ही ये भी सलाह दी कि मोबाइल तालुका कोर्ट(High Court acquits)की स्थापना की जाए जो दूूरवर्ती गांवों में असानी से पहुंच सके और लोगों को सहज न्याय उपलब्ध हो सके।

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