पाकिस्तान और अलगाववादियों ने सोशल मीडिया को बनाया आतंक का हथियार

पाकिस्तान और अलगाववादियों ने सोशल मीडिया को बनाया आतंक का हथियार
पाकिस्तान और अलगाववादियों ने सोशल मीडिया को बनाया आतंक का हथियार

एनयूजेआई की रिपोर्ट में कश्मीरी मीडिया को लेकर खुलासा, 370 हटने के बाद कश्मीरिों के दीहर मुद्दे भी आए चर्चा में

बिलासपुर

कश्मीर से लौटे एनयूजे-आई के प्रतिनिधिमंडल ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष चंद्रमौली कुमार प्रसाद को एनयूजे आई तथ्यान्वेषी दल की रिपोर्ट सौंपी। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स-इंडिया (एनयूजे-आई) के छह सदस्य प्रतिनिधिमंडल ने 10 से 15 सितंबर 2019 के मध्य जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था। इस दौरान कश्मीरी मीडिया के संबंध में एक अध्ययन रिपोर्ट तैयार की गई। प्रतिनिधिमंडल ने घाटी से प्रकाशित अखबारों अन्य मीडिया माध्यमों की स्थिति, निष्पक्षता जानने के लिए पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं अखबार विक्रेताओं से बात की। साथ ही श्रीनगर प्रेस क्लब भी गए। इसमें पाकिस्तान और अलगाववादियों ने कैसे सोशल मीडिया और प्रेस को आतंकवाद, अलगाववाद और हिंसा फैलाने का हथियार बना रखा था जैसे अचंभित तथ्य सामने आए हैं।

एनयूजेआई प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार हितेश शंकर, एनयूजे आई के राष्ट्रीय महासचिव मनोज वर्मा, एनयूजेआई के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राकेश आर्य, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुराग पुनैठा, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के महासचिव सचिन बुधौलिया, एनयूजे आई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हर्षवर्धन त्रिपाठी और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष आलोक गोस्वामी शामिल थे।

अब आम कश्मीरी के मुद्दों पर हो रही बात

अब अखबारों में भी आम कश्मीरियों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास व मौलिक ढांचे से जुड़े मुद्दों पर भी कवरेज दिख रहा है। चूंकि घाटी में अधिकांश मीडिया पाकिस्तान पोषित अलगाववादी और आतंकवादी संगठनों द्वारा नियंत्रित रहा है। ऐसे में आम कश्मीरी की हयात पर कभी चर्चा ही नहीं हो पाई। एनयूजेआई ने कश्मीर के विभिन्न अखबारों और माध्यमों की गहरी पड़ताल की। इसमें पाया कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर यहां भारत विरोधी जनमत बनाने का काम लगातार चलता रहा है। फेक न्यूज और सोशल मीडिया को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।

यह पाया एनयूजेआई ने अपनी रिपोर्ट में

1. कश्मीरी मीडिया पाकिस्तान पोषित अलगाववादी, आतंकवादी तंत्र के दबाव में काम कर रहा था।

2. पत्थरबाजी की खबरें प्लांट करवाना, मीडिया के सामने स्टोन पेल्टिंग करवाई जाती थी।

3. अफवाह फैलाने के लिए फेक न्यूज की फैक्ट्री खोल रखी थी।

4. भारतीय सैन्यबलों के लिए भड़काना।

5. झूठी खबरें सोशल मीडिया पर फैलाना, जिनसे भारत के विरुद्ध राय बने।

6. इंटरनेट, फोन पर पाबंदी से मुख्यधारा का मीडिया प्रभावित हुआ, लेकिन यह देश की अखंड़ता के लिए जरूरी था। प्रतिनिधि मंडल इसका समर्थन करता है।

7. श्रीनगर में मीडिया पर कोई पाबंदी नहीं है।

8. मीडिया पर आतंकवादियों का भय दिखा।

9. श्रीनगर में दिल्ली या देश के दूसरे शहरों से प्रकाशित बड़े माध्यमों के स्थानीय मुख्यालय नहीं हैं।

10. गैर-कश्मीरी पत्रकारों को वहां काम नहीं करने दिया जाता।

11. प्रशासन भी गैर-कश्मीरी पत्रकारों के साथ भेदभाव करता है।

12. प्रशासन और मीडिया में अलगाववादी और स्थानीय राजनीतिक दलों के समर्थकों की घुसपैठ है।

13. आतंकवाद और अलगाववाद के दबाव में एजेंडा आधारित पत्रकारिता के लिए वहां के पत्रकार मजबूर हैं।

14. मीडिया पर सुन्नी समुदाय का कब्जा है, इससे दूसरे समुदाय के लेखकर, पत्रकार स्वतंत्र काम नहीं कर पाते।

15. भारत से प्रकाशित समाचार पत्रों और चैनलों के कार्यालय नहीं हैं।

16. पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को पूरा वेतन या वेज बोर्ड नहीं मिलता।

17. खतरे के बीच काम के बावजूद पत्रकारों के लिए न पेंशन है न पोस्ट केयर।

18. आतंकवाद और अलगाववादी पोषित पत्रकारिता पर कठोरता से अंकुश लगाएं।

19. जाति और समुदाय के नाम पर पत्रकारों की मान्यता में भेदभाव समाप्त हो।

20. कश्मीर व सटे राज्यों में काम करने वाले पत्रकारों को बेहतर वेतन, पेंशन, सुरक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं दी जाएं।

21. जांच के नाम पर सुरक्षा बलों द्धारा पत्रकारों को बेवजह परेशान न किया जाए।

22. गैर कश्मीरी पत्रकारों को पत्रकारिता के सुरक्षित अवसर मिलें।

23. अन्य शहरों से प्रकाशित पत्रों, टीवी को कश्मीर में कार्यालय के लिए सुरक्षा दी जाए।

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