कार्तिक पूर्णिमा 30 को, दीप दान और गंगा स्नान का अधिक महत्व

इसी दिन गुरुनानक जयंती होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। पुराणों में भी इस पूर्णिमा का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि कार्तिक माह विष्णु जी को प्रिय होता है। इस दिन देव दिवाली मनाने की भी परंपरा है। दीपदान से देवता प्रसन्न होते हैं।

By: Karunakant Chaubey

Published: 29 Nov 2020, 11:15 PM IST

बिलासपुर. कार्तिक मास की अमावस्या का जितना महत्व माना गया है उतना ही महत्व कार्तिक मास की पूर्णिमा का माना जाता है। इस बार कार्तिक मास की पूर्णिमा 30 नवंबर को पड़ रही है। इस दिन दान और गंगा स्नान करने का विशेष महत्व माना गया है।

इसी दिन गुरुनानक जयंती होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। पुराणों में भी इस पूर्णिमा का विशेष महत्व बताया गया है क्योंकि कार्तिक माह विष्णु जी को प्रिय होता है। इस दिन देव दिवाली मनाने की भी परंपरा है। दीपदान से देवता प्रसन्न होते हैं।

पूर्णिमा तिथि कब से कब तक

कार्तिक पूर्णिमा आरंभ-29 नवंबर 2020 को रात 12 बजकर 47 मिनट से

कार्तिक पूर्णिमा समाप्त-30 नवंबर 2020 को रात 02 बजकर 59 मिनट तक

29 नवंबर की रात्रि में पूर्णिमा तिथि लगने के कारण 30 नवंबर को दान-स्नान किया जाएगा।

यह है पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी ब्रह्म सरोवर पुष्कर में अवतरित हुए थे। इस कारण कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर में स्नान को दिव्य माना गया है। कहा जाता है कि राजस्थान के पुष्कर में ही ब्रह्मा जी का एक मात्र मंदिर है। इस दिन इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली की कथा

देव दीपावली की कथा महर्षि विश्वामित्र से जुड़ी है। मान्यता है कि एक बार विश्वामित्र जी ने देवताओं की सत्ता को चुनौती दे दी। उन्होंने अपने तप के बल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। यह देखकर देवता अचंभित रह गए। विश्वामित्र जी ने ऐसा करके उनको एक प्रकार से चुनौती दे दी थी।

इस पर देवता त्रिशंकु को वापस पृथ्वी पर भेजने लगे, जिसे विश्वामित्र ने अपना अपमान समझा। उनको यह हार स्वीकार नहीं थी। तब उन्होंने अपने तपोबल से उसे हवा में ही रोक दिया और नई स्वर्ग तथा सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दी, इससे देवता भयभीत हो गए।

उन्होंने अपनी गलती की क्षमायाचना तथा विश्वामित्र को मनाने के लिए उनकी स्तुति प्रारंभ कर दी. अंतत: देवता सफल हुए और विश्वामित्र उनकी प्रार्थना से प्रसन्न हो गए। उन्होंने दूसरे स्वर्ग और सृष्टि की रचना बंद कर दी, इससे सभी देवता प्रसन्न हुए और उस दिन उन्होंने दिवाली मनाई, जिसे देव दीपावली कहा गया।

Karunakant Chaubey Desk/Reporting
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