टीवी न्यूज में ट्रेनिंग सिस्टम नहीं रहा, जो उस वक्त आए वे अब चैनल चला रहे

टीवी न्यूज में ट्रेनिंग सिस्टम नहीं रहा, जो उस वक्त आए वे अब चैनल चला रहे

Amil Shrivas | Publish: Sep, 11 2018 10:19:44 AM (IST) Bilaspur, Chhattisgarh, India

प्रसिद्ध पत्रकार राजेश बादल से ख़ास बातचीत

बिलासपुर पत्रिका. टीवी की उम्र बहुत कम है। इसलिए टीवी न्यूज हमें कुरूप स्वरूप में नजर आने लगे हैं। चूंकि इनका कोई इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य उद्योगों की तरह सदियों, सालों का बैकग्राउंड नहीं। यह कहना है देश के वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल का। बादल रविवार को कॉफी टॉक विद पत्रिका के मेहमान बने। इस बार के कॉफी टॉक विद पत्रिका में सह-साक्षात्कारकर्ता के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, सतीश जायसवाल और रामकुमार तिवारी भी शामिल हुए।

एक पीआरओ ले आया 5 लाख का ब्रीफकेस
पत्रकारिता में बेधडक़ होना जरूरी है। एक मामला 1991 में रायपुर का था जो मैंने उठाया तो उसे मैनेज करने के लिए एक रात कोई पीआरओ मेरे पास 5 लाख रुपए का ब्रीफकेस लेकर आया। मैंने उसे चलता किया और वह खबर प्रदेश की बड़ी खबर बन गई।

खोजी पत्रकारिता का अभाव
साल 1975-77 के आसपास सेंसरशिप से सामना हुआ। आजाद भारत में इस तरह की राजनीतिक चुनौतियों से पत्रकारिता की शुरुआत हुई तो वह वैल्यू, जोश और होश जीवन का हिस्सा बन गया। वह दौर खोजी पत्रकारिता का था। एक स्टोरी के लिए महीनों की मेहनत और बड़ी राशि खर्च की जाती थी। अब ऐसा कम होता है। लेकिन हालात जल्द बहाल होंगे।

टीवी ट्रेनिंग के कारण पीछे
टीवी की पैदाइश को 60 साल ही हुए हैं। जब भारत में टीवी आया तब अमेरिका में 42 करोड़ टीवी सेट थे। हमने 5 सेटों से शुरुआत की। फिर सरकार की प्राथमिकता से बाहर हो गया। ऐसे में इसमें अपना ट्रेनिंग सिस्टम नहीं बन पाया। टीवी चैनल एक आया पीछे दर्जनभर आ गए। इससे पेशेवर लोग कम पड़ गए। नतीजनत अनट्रेंड लोगों की भरमार हो गई। यही लोग आज चैनलों के हेड हैं।

खबरें थोपी क्यों जा रही हैं
वरिष्ठ साहित्यकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने पूछा, खबरें थोपी क्यों जा रही हैं। क्या अखबारों, टीवी के पास कोई फीडबैक नहीं। बादल ने कहा टीवी और अखबारों में वह कंटेंट नहीं जो पाठकों के लिए होना चाहिए। इसका एक कारण संपादक संस्था का विघटन है। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार तिवारी ने कहा कि क्या पत्रकारिता यह संक्रमण खत्म होगा। बादल ने कहा अगले कुछ वर्षों में खत्म होने की पूरी उम्मीद है। वहीं वरिष्ठ साहित्कार सतीश जायसवाल ने अपनी बात रखते हुए कहा इस दिशा में व्यापक काम करने की जरूरत है।

किताबें पढऩा अच्छी आदत
बहुत छोटे गांव से उठकर यहां तक पहुंचा हूं। समाज को देखना और जीना अच्छा लगता है। सप्ताह में एक किताब हर सूरत में पढऩा पिछले 40 सालों से बना हुआ है। फिल्में, गाने, साहित्य मेरे पसंदीदा विषयों में हैं। प्राचीन भारत के इतिहास को पढऩा मेरी कोर हॉबी में शामिल है। दिमागी भूख किताब से ही शांत हो सकती है। धर्म मेरे जीवन का हिस्सा है, पाखंड नहीं। परिवार को लेकर मैं भाग्यवान हूं भी रिश्ते बखूबी निभ रहे हैं। अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों को हमेशा तवज्जो देता हूं। दोस्तों के मामले में थोड़ा ज्यादा कॉन्सियन नहीं, लेकिन अच्छे दोस्त मेरे जीवन में पर्याप्त हैं।

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