तनाव से मुक्ति के लिए श्रेष्ठ उपाय है प्राणायाम

तनाव से मुक्ति के लिए श्रेष्ठ उपाय है प्राणायाम
Pranayama

Vikas Gupta | Updated: 23 Jun 2017, 06:07:00 PM (IST) तन-मन

मनोविकार यथा चिंता,  बेचैनी, अवसाद, उन्माद आदि विकारों की संभावनाएं क्षीण होती हैं, रोग होने पर तेजी से सुधार होता है, एकाग्रता बढ़ती है।

सभी प्राणायामों में मस्तिष्क में शुद्ध प्राणवायु (ऑक्सीजन) का संचार होता है जिससे मस्तिष्क ऊत्तकों को ताजगी व पोषण मिलता है। मस्तिष्क के कार्य यथा बुद्धि, धैर्य व स्मरण शक्ति अच्छे होते हैं। मनोविकार यथा चिंता,  बेचैनी, अवसाद, उन्माद आदि विकारों की संभावनाएं क्षीण होती हैं, रोग होने पर तेजी से सुधार होता है, एकाग्रता बढ़ती है।

प्राणायाम की तीन क्रियाएं 
प्राणायाम में श्वास लेते समय तीन क्रियाएं होती हैं- 
पूरक
नियंत्रित गति से श्वास भीतर लेने की क्रिया पूरक है। श्वास भीतर खींचते समय लय और समय अनुपातिक होना आवश्यक है।
कुंभक
भीतर ली हुई श्वास को क्षमतानुसार फेफड़ों में ही रोके रखने की प्रक्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोडऩे के बाद कुछ देर बाहर ही रोके रखने को बाहरी कुंभक कहते हैं। 
रेचक
भीतर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से बाहर छोडऩे की क्रिया रेचक हैं। श्वास धीरे-धीरे अथवा तेज गति से जब छोड़ते हैं तो इनमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

मुख्य प्राणायाम और उनके लाभ
भस्त्रिका
सुखासन, पदमासन, वज्रासन, सिद्धासन, में से किसी एक में बैठकर नाक से लम्बी सांस फेफडों में भरें। फिर लम्बी सांस छोड़ें। सांस लेते व छोड़ते समय दबाव एक समान बना रहे। सांस भीतर लेते समय पूरी सांस लें।
लाभ 
हृदय और फेफड़े सशक्त होते हैं। मस्तिष्क संबन्धी व्याधियों का शमन होता है। पार्किन्संस डिजीज पैरा-लाइसिस व स्नायु विकार दूर होता है। सर्दी, जुकाम, एलर्जी दूर होती है। मस्तिष्क को नई ऊर्जा मिलती है।

कपालभाति
सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन या  वज्रासन में से किसी एक अवस्था में बैठें। सांस को बाहर छोड़ते समय पेट को अन्दर की तरफ  धक्का देना है। इसमें केवल सांस को छोड़ते रहना है। दो श्वासों के बीच श्वास अपने आप भीतर चली जाती है। श्रमपूर्वक श्वास भीतर नहीं लेना है। 
लाभ 
कपालभाति से गैस, कब्ज, मधुमेह, मोटापा रोग दूर होते हैं। चेहरे पर कांति आती है और कई मौसमी और आम बीमारियां पूरी तरह दूर रहती हैं। 

अनुलोम-विलोम
पद्मासन, सिद्धासन, सुखासन या स्वास्तिकासन में से किसी एक में बैठ जाएं। दाएं हाथ के अंगूठे से दाएं नासिका छिद्र को दबाकर बंद कर लें और नासिका के बाएं छिद्र से 4 से 5 सैकंड में श्वास भरें। फिर बाईं नासिका को अनामिका व मध्यमा अंगुली से दबाएं। दाईं नासिका को खोलकर श्वास बाहर छोड़ें। फिर, दाहिनी नासिका से ही पुन: श्वास भरें। फिर दाईं नाक को बंद करके बाईं नासिका खोल कर श्वास बाहर निकालें। 
लाभ 
प्रतिदिन 10 मिनट तक अनुलोम-विलोम करने से शिरोवेदना ठीक होती है। नकारात्मक चिंतन से बचते हैं। आनंद, उत्साह और सकारात्मकता बढती है। फेफड़े व हृदय शक्तिशाली होते हैं। सर्दी, जुकाम, श्वास बीमारियों से बचाव होता है। 

भ्रामरी
पदमासन, सिद्धासन या सुखासन मेंं से किसी एक में बैठ जाएं। आंखें बंद करें। नासिका से लम्बा गहरा श्वास खींचें। फिर श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ें। श्वास छोड़ते हुए भंवरे जैसी आवाज नाक से निकालें। इस प्रकार एक चक्र पूर्ण होता है। दूसरी विधि में अंगूठों से कर्ण छिद्र बंद कर लें। तर्जनी अंगुली से आंखों को बंद करें और नासिका रंध्रों को मध्यमा अंगुली से बंद करें। इसे षड्मुखी मुद्रा कहते हैं। इसके 20-30 चक्र करें। 
लाभ 
चिंता, क्रोध एवं अतिसक्रियता व तनाव से मुक्ति दिलाता है।  शांति, एकाग्रता बढ़ाता है। 

शीतली
पदमासन, सिद्धासन या सुखासन में से किसी एक मुद्रा में बैठ जाएं। ज्ञान मुद्रा या अंजली मुद्रा में अपने हाथों को घुटनों पर रखें। जीभ को किनारों से मोड़ कर नौकाकार बना लें  और सांस लेते हुए जितना हो सके, हवा शरीर के अंदर प्रवेश करवाएं और मुंह बंद कर लें। जालंधर बंध मुद्रा में जितनी देर हो सके, सांस को रोक कर रखें। जालंधर बंध मुद्रा से वापिस और नासिका रंध्रों से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें। इसके 10-12 चक्र तक करें।
लाभ 
रक्त शुद्धि, गैस, अपच, बदहजमी, त्वचा व नेत्र के लिए लाभप्रद है। 

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