गर्मियों में रहेंगे सावधान तो अस्थमा से नहीं होंगे परेशान

वैसे तो हर मौसम अस्थमा पेशेंट्स के लिए चुनौती भरा होता है लेकिन गर्मियों में गर्म हवाओं के साथ धूल-मिट्टी के कण अस्थमा पेशेंट्स की समस्या बढ़ा देते है

By: शंकर शर्मा

Published: 25 Apr 2018, 12:12 AM IST

वैसे तो हर मौसम अस्थमा पेशेंट्स के लिए चुनौती भरा होता है लेकिन गर्मियों में गर्म हवाओं के साथ धूल-मिट्टी के कण अस्थमा पेशेंट्स की समस्या बढ़ा देते हैं। इस मौसम में अस्थमा पेशेंट्स खानपान व रहन-सहन को लेकर लापरवाही न बरतें।

यह लक्षण तो हो जाएं सावधान
सीने में दर्द और सांस लेने में दिक्कत होना।
कफ और बलगम की समस्या होना।
जरा सा काम करने पर ही सांस फूलने की शिकायत होना।
सांस लेते वक्त हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज आना।
लगातार खांसना खास तौर पर रात में सोते वक्त।
हमेशा थकान और कमजोरी महसूस करना।
रोग के शुरुआत में रोगी को खांसी, सरसराहट और सांस उखडऩे के दौरे पडऩे लगते हैं।

इसलिए होता है अस्थमा
श्वसन नलिकाओं में सूजन आने के साथ ही अस्थमा की समस्या सामने खड़ी होने लगती है। दरअसल श्वसन नलिकाएं फेफड़ों से हवा को अंदर-बाहर करने का काम करती हैं। सूजन आने से नलिकाएं संकरी और संवेदनशील हो जाती हैं जिससे फेफड़ों में हवा कम पहुंचती है। जब हवा के साथ धूल-मिट्टी या प्रदूषण के कण पहुंचते हैं तो दम घुटने से अनुभव होने लगता है। इसका मतलब है कि श्वसन नलिकाओं का बंद होना। लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने पर व्यक्ति की जान तक जा सकती है।

इसलिए बढ़ती है समस्या
गर्मी के मौसम में धूल ज्यादा उड़ती है जिससे एलर्जी की आशंका बढ़ जाती है। इसी तरह एसी या फ्रिज का पानी पीने से भी यह समस्या और बढ़ सकती है। दरअसल सर्द-गर्म से भी एलर्जी की आशंका बढ़ जाती है। बारिश के मौसम में तो अस्थमा के मरीजों की संख्या में काफी इजाफा हो जाता है। ऐसे में अभी से मरीजों को सावधानी बरतनी चाहिए।

और भी हैं कई कारण
खानपान का गलत तरीका, नशीले पदार्थों का अत्यधिक सेवन, अधिक समय तक खांसी, नजला, जुकाम का होना, फेफड़ों, दिल, गुर्दों, आंतों आदि में कमजोरी से भी दमा हो जाता हैै। दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल भी कफ को सुखा देता है जिससे अस्थमा की समस्या होने लगती है। ज्यादा समय तक यह समस्या नुकसानदायक हो सकती है।

यह अपनाएं उपाय
योग .... योगासन और प्राणायाम करने से फेफड़े मजबूत होते हैं और श्वसन प्रक्रिया भी अच्छी होती है। सुबह के समय स्वच्छ और साफ हवा में सांस लेने और छोडऩे से शरीर को पूरी ऊर्जा मिलती है।
शहद....शहद से बलगम ठीक होता है जो अस्थमा की समस्या पैदा करता है। गुनगुने पानी के साथ शहद मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।
अजवायन....सांस लेने में तकलीफ से राहत के लिए पानी में अजवायन डालकर उबालें और भाप लें। इसके अलावा अजवायन के रस में पानी मिलाकर सुबह-शाम लेने से भी राहत मिलती है।
अंजीर....अंजीर भी कफ को जमने से रोकता है। रातभर भिगोने के बाद सुबह खाली पेट इसे खाने से बलगम ढीला होता है और संक्रमण से भी राहत मिलती है।
अदरक-लहसुन....अदरक और लहसुन से भी अस्थमा के इलाज में लाभ मिलता है। अस्थमा की शुरूआती अवस्था में दूध में लहसुन की कलियां उबालकर पीने और अदरक की चाय में लहसुन की कलियां मिलाकर भी सेवन करने से राहत मिलती है।

भ्रांतियों से बचें अस्थमा पर कंट्रोल करें
अस्थमा कंट्रोल हो सकता है लेकिन जड़ से खत्म नहीं?
लाइफस्टाइल में बदलाव, दवाइयों और अस्थमा के कारकों से दूर रहकर इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन ज्यादातर लोग ऐसा कर नहीं पाते इसलिए उन्हें इसे नियंत्रित करना भी मुश्किल लगता है। कई लोग मानते हैं कि प्राकृतिक उपाय या खाने वाली दवाइयों से अस्थमा को जड़ से खत्म किया जा सकता है लेकिन वास्तव में इसे नियंत्रित ही किया जा सकता है।


अस्थमा के लक्षण पहचानना आसान है क्योंकि यह सभी में एक जैसे ही होते हैं।
सभी लोगों में अस्थमा से संबंधित एक ही तरह के लक्षण दिखाई दें यह जरूरी नहीं है। दरअसल पर्यावरण में आए बदलावों और उम्र के साथ शरीर में होने वाले बदलाव से अस्थमा के लक्षण सभी में एक जैसे नहीं होते हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि अस्थमा के लक्षण नहीं पता लगने पर अस्थमा पूरी तरह ठीक हो गया है।


अस्थमा की दवाइयों में स्टेरॉइड होने से यह सुरक्षित नहीं होती हैं।
अस्थमा की दवाइयों में इतनी ही मात्रा में स्टेरॉयड मिलाई जाती है जो नुकसान न करे। साथ ही इसे इनहेल किया जाता है और इसका सीधा वहीं असर होता है जहां इसकी जरूरत होती है। इन्हेलर का इस्तेमाल करने के बाद मुंह धोने से भी इसके अवशेष हट जाते हैं जिससे इन्हें निगलने की आशंका कम रहती है।


अस्थमा के मरीजों को एक्सरसाइज नहीं करना चाहिए।
वास्तविकता में एक्सरसाइज अस्थमा के मरीजों के लिए जरूरी होती है क्योंकि इससे फेफड़े और दिल मजबूत होते हैं। साथ ही इससे इम्यूनिटी भी बढ़ती है और एंजाइटी भी कम होती है।


अस्थमा के मरीजों को डाई क्लाइमेट में रहना चाहिए।
क्लाइमेट का असर भले ही इस बीमारी पर पड़ता है। लेकिन जरूरी नहीं है कि जगह बदलने से इसके बाकी कारकों से बचा जाए। एलर्जी के कारकों, धूल-मिट्टी या अन्य कारणों पर नियंत्रण कर इस बीमारी को कंटोल में रखा जा सकता है। सप्लीमेंट्स या नैचुरल थैरेपीज अस्थमा को पूरा खत्म नहीं कर सकता है।

शंकर शर्मा
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