Amitabh Bachchan Birthday : अमिताभ ने उत्तर भारतीयों को दी पुख्ता इमेज, अदाकारी में मिट्टी की महक

By: पवन राणा
| Published: 11 Oct 2020, 12:09 PM IST
Amitabh Bachchan Birthday : अमिताभ ने उत्तर भारतीयों को दी पुख्ता इमेज, अदाकारी में मिट्टी की महक
Amitabh Bachchan Birthday : अमिताभ ने उत्तर भारतीयों को दी पुख्ता इमेज, अदाकारी में मिट्टी की महक

ख्वाजा अहमद अब्बास की 'सात हिन्दुस्तानी' के क्रांतिकारी नौजवान कवि के किरदार में अमिताभ ( Amitabh Bachchan ) ठेठ उत्तर भारतीय लगे थे। उस दौर में कहा गया कि अगर उन्होंने खुद को उत्तर भारतीय की इमेज से आजाद नहीं किया, तो वे ज्यादा दूर तक नहीं जा पाएंगे। लेकिन इसी इमेज ने अमिताभ को बुलंदी अता की। बुलंदी भी ऐसी कि 'न भूतो न भविष्यति'।

-दिनेश ठाकुर

हिन्दी सिनेमा में कभी पंजाबी और उर्दू से जुड़ी हस्तियों का दबदबा था। उत्तर भारतीयों की इस हद तक उपेक्षा होती थी कि ज्यादातर फिल्मों में अवधी या भोजपुरी के टूटे-फूटे संवाद बोलने का जिम्मा या तो नौकरों का किरदार करने वालों को सौंपा जाता था या विदूषकों को। न फिल्मी लेखकों को अवधी, भोजपुरी और हिन्दी की दूसरी बोलियों की समझ थी, न पर्दे पर इन्हें बोलने वालों को। सिर्फ चरित्र अभिनेता कन्हैयालाल, जो बनारस के थे, इन बोलियों के संवाद सलीके से बोलते थे, लेकिन उनका दायरा सीमित था। उत्तर भारतीयों के इस दायरे को विराट किया अमिताभ बच्चन ( Amitabh Bachchan ) ने। कई दूसरे पहलुओं की तरह उनका यह योगदान भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने हिन्दी सिनेमा में उत्तर भारतीयों को नई और पुख्ता इमेज दी। पहली फिल्म 'सात हिन्दुस्तानी' से लेकर 'जंजीर' से पहले तक अपने संक्रमण काल में उन्होंने जिन फिल्मों (बंसी बिरजू, एक नजर, रास्ते का पत्थर, बंधे हाथ, परवाना, संजोग) में काम किया, अगर कामयाब रहतीं, तो लोगों का ध्यान काफी पहले उनके बोलने के अंदाज और हाव-भाव पर जा चुका होता, जिनमें उत्तर भारत की मिट्टी की महक रची-बसी है।

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ख्वाजा अहमद अब्बास की 'सात हिन्दुस्तानी' के क्रांतिकारी नौजवान कवि के किरदार में अमिताभ ठेठ उत्तर भारतीय लगे थे। उस दौर में कहा गया कि अगर उन्होंने खुद को उत्तर भारतीय की इमेज से आजाद नहीं किया, तो वे ज्यादा दूर तक नहीं जा पाएंगे। लेकिन इसी इमेज ने अमिताभ को बुलंदी अता की। बुलंदी भी ऐसी कि 'न भूतो न भविष्यति'। निर्देशक रवि टंडन ने, जिन्होंने अमिताभ को लेकर 'मजबूर' (1974) बनाई, इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही कह दिया था कि अमिताभ के व्यक्तित्व में जो इलाहाबादी रंग-ढंग हैं, एक दिन वही उनकी सबसे बड़ी ताकत होंगे।

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अमिताभ का ठेठ उत्तर भारतीय रूप चंद्रा बारोट की 'डॉन' में जादू बनकर उभरा। इस फिल्म में उनका डबल रोल था। उत्तर प्रदेश के भैया के रूप में 'खइके पान बनारस वाला' गीत पर उनका नृत्य, भंग की तरंग में पान खाने और थूकने का सलीका, हाव-भाव- यह सब इतना सहज तथा ताजगी लिए हुए था कि यह किरदार उनके डॉन के किरदार पर भारी पड़ा। यही जादू बाद में 'सिलसिला' के 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली' में दोहराया गया।

अमिताभ बच्चन का बचपन इलाहाबाद में बीता और पढ़ाई-लिखाई नैनीताल में हुई। इसीलिए उनकी अदाकारी में उत्तर भारतीयता छन-छनकर महसूस होती है। उनकी जिस आवाज को ऑल इंडिया रेडियो ने प्रसारण के काबिल नहीं माना था, उसने कितनी फिल्मों में कैसे-कैसे जादू जगाए, सभी जानते हैं। 'भुवन शोम', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'लगान', 'जोधा अकबर' समेत कई फिल्मों में यह आवाज कमेंट्री के लिए इस्तेमाल की गई। इस आवाज में 'मेरे पास आओ', 'नीला आसमान सो गया' और 'एकला चालो रे' जैसे कई गीत सुनकर भी उत्तर भारतीयता मुस्कुराती है।

अमिताभ चाहे जिस किरदार में पर्दे पर नजर आएं, उनकी अदाकारी में अवधी और भोजपुरी की मिली-जुली संस्कृति तथा हाव-भाव का असर खुद-ब-खुद छलक पड़ता है। 'शराबी को शराबी नहीं तो क्या पुजारी कहोगे और गेहूं को गेहूं नहीं को क्या ज्वारी कहोगे' (शराबी) जैसे आम संवाद भी उनकी अदायगी से खास हो जाते हैं। वे 11 अक्टूबर को 78 साल के हो रहे हैं। मनोरंजन की दुनिया में आज भी वे जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।