घर से 100 रुपए चुराकर एक्टर बनने निकले थे अनुपम खेर, जानें उनके जीवन के अनसुने किस्से

By: Mahendra Yadav
| Published: 07 Mar 2020, 09:07 PM IST
घर से 100 रुपए चुराकर एक्टर बनने निकले थे अनुपम खेर, जानें उनके जीवन के अनसुने किस्से
Anupam kher

किरदार कैसा भी हो, छा जाने में माहिर हैं अनुपम खेर

महेश भट्ट की 'सारांश' (1984) बी.वी. प्रधान नाम के 65 वर्षीय वृद्ध की कहानी है, जो विभिन्न मोर्चों पर प्रतिकूल हालात से जूझ रहा है। इस किरदार के साथ अनुपम खेर अलग पहचान के साथ उभरे। कई लोग उन्हें वाकई वृद्ध मान बैठे थे, जबकि उस समय वह सिर्फ 29 साल के थे। 'सारांश' से पहले वह मुजफ्फर अली की 'आगमन' (1982) में काम कर चुके थे। शिमला में 7 मार्च, 1955 को जन्मे अनुपम खेर कश्मीरी पंडित हैं। एक्टर बनने की धुन में वह घर से 100 रुपए चुराकर निकले थे। मुम्बई पहुंचने के बाद उन्हें लम्बा संघर्ष करना पड़ा। एक महीने उनकी रातें रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बीतीं। बाद में उन्होंने एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया, जिसमें चार और संघर्षशील युवक रहते थे। 'सारांश' के बाद अनुपम खेर के लिए संभावनाओं के रास्ते खुलते गए। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया। लीक से हटकर बनी फिल्में हों या फार्मूलों वाली, उन्होंने अपने किरदार जिंदादिली से अदा किए। फिर वह महेश भट्ट की 'डैडी' (1989) में शराबी का किरदार हो, आमिर खान की 'दिल' (1990) में कंजूस पिता का या सुभाष घई की 'कर्मा' में डॉ. डेंग का, जो दिलीप कुमार से थप्पड़ खाने के बाद तबाही मचा देता है। 'कर्मा' से पहले वह सनी देओल की 'अर्जुन' में भी खलनायकी के रंग दिखा चुके थे। कॉमेडी पर भी उनकी जबरदस्त पकड़ है। श्रीदेवी की 'चालबाज' (1989) में उन्होंने खलनायकी और कॉमेडी के मिक्स रंग दिखाए। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'राव साहब' (1985), तेजाब (1987), निगाहें (1988), चांदनी (1989), हम (1991), बेटा (1992), हम आपके हैं कौन (1994), दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995), कहो न प्यार है (2000), मैंने गांधी को नहीं मारा (2005) और 'सिंघम रिटन्र्स' (2014) शामिल हैं। उन्होंने 'ओम जय जगदीश' (2002) का निर्देशन भी किया।

 

घर से 100 रुपए चुराकर एक्टर बनने निकले थे अनुपम खेर, जानें उनके जीवन के अनसुने किस्से

हॉलीवुड फिल्मों में भी चमके
अनुपम खेर ने हॉलीवुड फिल्मों में भी सिक्का जमाया। इनमें 'बैंड इट लाइक बेकहम' (2002), ब्राइड एंड प्रेजुडिस (2004), लस्ट (2007) और 'स्पीडी सिंघ्स' (2011) जैसी फिल्में शामिल हैं। वह रंगमंच पर भी सक्रिय रहे। देश में कई जगह उनके नाटकों का मंचन हो चुका है। उन्होंने खुद एक नाटक 'कुछ भी हो सकता है' लिखा।

घर से 100 रुपए चुराकर एक्टर बनने निकले थे अनुपम खेर, जानें उनके जीवन के अनसुने किस्से

अलंकरण और नियुक्तियां
भारत सरकार ने अनुपम खेर को सिनेमा और कला क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 2004 में पद्मश्री और 2016 में पद्म भूषण से अलंकृत किया। वह नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं। अक्टूबर 2017 में उन्हें फिल्म-टीवी इंस्टीट्यूट का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, लेकिन एक अमरीकी टीवी शो की व्यस्तता का हवाला देकर कुछ दिन बाद उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी अभिनेत्री पत्नी किरण खेर भाजपा की सांसद हैं।