स्वाधीनता सेनानियों पर पहली फिल्म, यूं खुला अचर्चित अध्याय

By: पवन राणा
| Updated: 14 Aug 2020, 10:26 PM IST
स्वाधीनता सेनानियों पर पहली फिल्म, यूं खुला अचर्चित अध्याय
स्वाधीनता सेनानियों पर पहली फिल्म, यूं खुला अचर्चित अध्याय

सिनेमा तकनीक तब शुरुआती दौर में थी, फिर भी इस फिल्म में 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार और क्रांतिकारियों की गतिविधियों को प्रभावी ढंग से फिल्माया गया। कई साल बाद 'लगान' ( Lagaan Movie ) के निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ने चटगांव आर्मरी रेड पर 'खेलेंगे हम जी जान से' ( Khelein Hum Jee Jaan Sey ) (2010) बनाई।

-दिनेश ठाकुर


देश की आजादी के लिए लड़ाई की कथाएं और उप कथाएं आसमान के तारों और समुद्र की लहरों की तरह असंख्य हैं। इनमें से कई सामने आ चुकी हैं तो कई अब भी इतिहास के पन्नों में दबी पड़ी हैं। चटगांव आर्मरी रेड के किस्से से भी दुनिया बेखबर रहती, अगर निर्माता एस.डी. नारंग ने इस पर फिल्म नहीं बनाई होती। बांग्ला में 'चट्टग्राम एस्ट्रेगर लुनथन' (1949) नाम की इस फिल्म का निर्देशन निर्मल चौधरी ने किया था। इसे स्वाधीनता सेनानियों पर पहली भारतीय फिल्म माना जाता है। एस.डी. नारंग कभी लाहौर में आबाद थे। वहां मेडिकल की पढ़ाई करते हुए वे 'खजांची' नाम की फिल्म में काम कर चुके थे। देश के बंटवारे के बाद वे कोलकाता आ गए। चटगांव आर्मरी रेड के क्रांतिकारियों के किस्से सुनने के बाद उन्होंने महसूस किया कि इस पर फिल्म बननी चाहिए। महान क्रांतिकारी सूर्यसेन की अगुवाई में स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने 18 अप्रेल, 1930 को चटगांव (अब बांग्लादेश) में पुलिस के हथियारों के गोदाम पर छापा मार कर उसे लूटने की कोशिश की थी, ताकि ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ाई को धारदार बनाया जा सके। कोशिश नाकाम रही। ब्रिटिश फौज से संघर्ष में कई क्रांतिकारी मारे गए। सूर्यसेन पर मुकदमा चला और उन्हें फांसी की सजा दे दी गई।

'चट्टग्राम एस्ट्रेगर लुनथन' में सूर्यसेन का किरदार भबेन मजूमदार ने अदा किया। यह उनकी पहली फिल्म थी। सिनेमा तकनीक तब शुरुआती दौर में थी, फिर भी इस फिल्म में 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार और क्रांतिकारियों की गतिविधियों को प्रभावी ढंग से फिल्माया गया। कई साल बाद 'लगान' के निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ने चटगांव आर्मरी रेड पर 'खेलेंगे हम जी जान से' ( Khelein Hum Jee Jaan Sey ) (2010) बनाई। मानिनी चटर्जी की किताब 'डू एंड डाय : द चटगांव अपराइजिंग' पर आधारित इस फिल्म में अभिषेक बच्चन ( Abhishek Bachchan ) ने सूर्यसेन का किरदार अदा किया। दीपिका पादुकोण ( Deepika Padukone ) और सिकंदर खेर दूसरे अहम किरदारों में नजर आए। 'खेलेंगे हम जी जान से' के दो साल बाद इसी किस्से पर एक और फिल्म 'चिट्टगोंग' बनाई गई। इसमें सूर्यसेन के किरदार में मनोज वाजपेयी ( Manoj Bajpayee ) नजर आए, जबकि बाकी कलाकारों में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजकुमार राव और जयदीप अहलावत शामिल हैं।

टोटल ट्रीटमेंट के लिहाज से 'खेलेंगे हम जी जान से' के मुकाबले बांग्ला फिल्मकार वेदव्रत पेन की 'चिट्टगोंग' ज्यादा प्रभावशाली रही। वेदव्रत अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा में वैज्ञानिक थे। वहां की नौकरी से इस्तीफा देकर उन्होंने यह फिल्म बनाई। 'चिट्टगोंग' को नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया था। पहले की दो फिल्मों की तरह यह भी चटगांव आर्मरी रेड का ऐतिहासिक दस्तावेज है।

Aamir khan Abhishek Bachchan