'गुलाबो सिताबो' की फातिमा बेगम सुर्खियों में, छोटे किरदार में डाल दी जान

By: पवन राणा
| Updated: 18 Jun 2020, 11:09 PM IST
'गुलाबो सिताबो' की फातिमा बेगम सुर्खियों में, छोटे किरदार में डाल दी जान
'गुलाबो सिताबो' की फातिमा बेगम सुर्खियों में, छोटे किरदार में डाल दी जान

शौक इंसान को कहां से कहां ले जाता है, फारुक जफर ( Farrukh Jaffar ) इसकी मिसाल हैं। वे बचपन से बातूनी थीं। लोगों से बात करने के शौक ने साठ के दशक में उन्हें रेडियो से जोड़ दिया। वे आकाशवाणी लखनऊ की पहली महिला उद्घोषिका रही हैं। उस जमाने में उनके 'गीतों भरी कहानी' और 'पंचरंगी' जैसे कार्यक्रम काफी लोकप्रिय थे।

-दिनेश ठाकुर
शूजित सरकार की 'गुलाबो सिताबो' ( Gulabo Sitabo ) के लिए सबसे ज्यादा तारीफ इसके बुजुर्ग मिर्जा अमिताभ बच्चन ( Amitabh Bachchan ) बटोर रहे हैं। बांके आयुष्मान खुराना ( Ayushmaan Khurrana ) की भी चर्चा हो रही है। यह दोनों फिल्म के अहम किरदार हैं, इसलिए इनकी चर्चा लाजिमी है, लेकिन अगर छोटे-से किरदार में वयोवृद्ध अदाकारा फारुख जफर ( Farrukh Jaffar ) की भी चर्चा हो रही है तो इसका श्रेय उनकी सहज और जिंदादिली से भरपूर अदाकारी को जाता है।

फिल्म के बीच-बीच में वे बहुत कम समय के लिए पर्दे पर आती हैं, फिर भी आखिर तक उनकी मौजूदगी महसूस होती है। वे 78 साल के मिर्जा की बीवी फातिमा बेगम के किरदार में हैं। फिल्म में उनकी उम्र मिर्जा से 15 साल ज्यादा बताई गई है, लेकिन हकीकत में वे 87 साल की हैं। उनका खास तरह से आंखें घुमाना और बतियाने का लखनवी अंदाज अलग छाप छोड़ जाता है। इस उम्र में पर्दे पर उनका कमाल इस तथ्य को गहराई से रेखांकित करता है कि हौसला और जज्बा हो तो उम्र सक्रियता में कभी बैरियर खड़े नहीं करती।

शौक इंसान को कहां से कहां ले जाता है, फारुक जफर इसकी मिसाल हैं। वे बचपन से बातूनी थीं। लोगों से बात करने के शौक ने साठ के दशक में उन्हें रेडियो से जोड़ दिया। वे आकाशवाणी लखनऊ की पहली महिला उद्घोषिका रही हैं। उस जमाने में उनके 'गीतों भरी कहानी' और 'पंचरंगी' जैसे कार्यक्रम काफी लोकप्रिय थे। कुछ साल आकाशवाणी दिल्ली में भी काम करने के बाद उन्होंने रेडियो की नौकरी यह कहकर छोड़ दी कि दिल्ली उन्हें रास नहीं आई। लखनऊ लौटकर वे नाटकों से जुड़ीं और यहीं से उनके लिए फिल्मों का रास्ता खुला। फिल्में देखने का शौक भी उन्हें बचपन से था। शायद यही शौक 'खुल जा सिम-सिम' साबित हुआ।

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जब भी हमारे देश में कोई नौजवान अभिनय के क्षेत्र में कदम रखना चाहता है तो उसका ध्येय होता है अमिताभ बच्चन। मेरी आख़िरी फ़िल्म में एक dialogue था कि बच्चन बनते नहीं है, बच्चन तो बस होते हैं। जब मैंने बचपन में चंडीगढ़ के नीलम सिनमा में “हम” देखी थी और बढ़े से बच्चन को बढ़े से पर्दे पर देखा था तो शरीर में ऐसी ऊर्जा उत्पन्न हुई जिसने मुझे अभिनेता बनने पर मजबूर कर दिया। मेरा पहला tv शूट मुकेश मिल्ज़ में हुआ था और यही वो जगह थी जहां जुम्मा चुम्मा दे दे शूट हुआ था। उस दिन मुझे I have arrived वाली feeling आ गयी थी। अगर तब यह हाल था तो आज आप सोच सकते होंगे मैं किस अनुभूति से गुज़र रहा होऊँगा। गुलाबो सिताबो में मेरे सामने बतौर ‘सह’ कलाकार यह हस्ती खड़ी थी और किरदारों की प्रवृति ऐसी थी की हमें एक दूसरे को बहुत ‘सहना’ पड़ा। वैसे असल में मेरी क्या मजाल की मैं उनके सामने कुछ बोल पाऊँ। इस विसमयकारी अनुभव के लिए मैं शूजित दा का धन्यवाद करना चाहूँगा की उन्होंने मुझे अमिताभ बच्चन जैसे महानायक के साथ एक फ़्रेम में दिखाया है। दादा आप मेरे गुरू हैं, आपका हाथ थाम कर यहाँ तक पहुँचा हूँ। “सौ जन्म क़ुर्बान यह जन्म पाने के लिए, ज़िंदगी ने दिए मौक़े हज़ार हुनर दिखाने के लिए।” -आयुष्मान 🙏🏻 Catch #GiboSiboOnPrime today!

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मुजफ्फर अली की 'उमराव जान' (1981) उनकी पहली फिल्म है। इसमें उन्होंने रेखा की मां का किरदार अदा किया था। उन्होंने 'हुस्ने-जाना', 'आधा गांव' और 'नीम का पेड़' जैसे टीवी धारावाहिकों में भी अदाकारी के जौहर दिखाए। शाहरुख खान की 'स्वदेश' में वे फातिमा बी के किरदार में थीं, जो एक सीन में कहती है- 'बर्फ का मुकद्दर होता है अपने ही पानी में पिघलते जाना।' उम्र पिघलती रही और वे आमिर खान की 'पीपली लाइव', 'सीक्रेट सुपर स्टार', सलमान खान की 'सुलतान' के अलावा दूसरे कलाकारों की 'चक्रव्यूह', 'तनु वेड्स मनु', 'फोटोग्राफ', 'अनवर का अजब किस्सा' आदि फिल्मों में अदाकारी के रंग घोलती रहीं। किसी भी कलाकार के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि उसकी कोई फिल्म देखकर लोग उसकी अगली फिल्म का इंतजार करें। 'गुलाबो सिताबो' से फारुक जफर ने यह उपलब्धि हासिल कर ली है।

Ayushmann Khurrana