इंटरनेट पर संक्रमण की थीम वाली फिल्मों की धूम

By: पवन राणा
| Updated: 27 Mar 2020, 10:35 PM IST
इंटरनेट पर संक्रमण की थीम वाली फिल्मों की धूम
इंटरनेट पर संक्रमण की थीम वाली फिल्मों की धूम

हथियार से नहीं, दिमाग से लड़ो

-दिनेश ठाकुर

ऐसे दौर में, जब कोरोना को लेकर अंतरराष्ट्रीय आपातकाल जैसे हालात हों, दुनियाभर में कामकाज की रफ्तार धीमी पड़ गई हो, सिनेमाघर बंद पड़े हों, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कुछ फिल्मों ने धमाका कर रखा है। यह फिल्में धड़ाधड़ वायरल हो रही हैं और फटाफट डाउनलोड की जा रही हैं। दो फिल्में सबसे ज्यादा देखी जा रही हैं। इनमें एक है हॉलीवुड की 'कंटेजन' (2011) और दूसरी है भारतीय 'वायरस' (2019)। हैरानी की बात है कि मलयालम भाषा की 'वायरस' ने पिछले साल दक्षिण भारत के सिनेमाघरों में अच्छा-खासा कारोबार किया था, लेकिन इसकी गूंज उत्तर भारत तक नहीं पहुंची।

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अब जब एक वायरस ने सबकी नींद उड़ा रखी है, निर्देशक आशिक अबू की 'वायरस' को हाथों-हाथ लिया जा रहा है। केरल में पिछले साल जून में निपाह वायरस ने खासी सनसनी फैलाई थी। कुछ मौतें भी दर्ज की गई थीं। हालांकि वायरस केरल से बाहर नहीं फैला था, लेकिन उन्हीं दिनों हिमाचल प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में कुछ मरे हुए चमगादड़ मिलने से वहां भी दहशत फैल गई थी। केरल में तब के घटनाक्रम के आधार पर 'वायरस' का ताना-बाना बुना गया। फिल्म बड़ी गहराई से इस तथ्य को रेखांकित करती है कि वाइरस के हमले का कारगर मुकाबला हथियारों से नहीं, दिमाग से किया जाता है। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग कोझिकोड के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में की गई, जहां के डॉक्टरों और नर्सों की लगन, निष्ठा तथा हौसले ने निपाह वायरस को परास्त कर दुनिया में नई नजीर पेश की थी। फिल्म में एक संक्रमित आदमी को अस्पताल लाया जाता है। डॉक्टर-नर्सों की टीम उसके इलाज में जुटती है। इसी दौरान 15 और जने इस वायरस की चपेट में आ जाते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद टीम इन 16 जनों को तो नहीं बचा पाती (इनमें एक नर्स शामिल है), लेकिन वायरस के फैलाव पर कफी हद तक काबू पा लिया जाता है। केरल में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा दूसरे प्रदेशों के मुकाबले काफी बेहतर है। यह फिल्म देखकर यह बात शिद्दत से महसूस होती है कि पूरे देश में स्वास्थ्य सेवाएं इतनी सजग और चुस्त-दुरुस्त हों तो इस तरह के खतरों से निपटने में काफी मदद मिल सकती है। 'वायरस' के निर्देशक आशिक अबू मलयालम सिनेमा के प्रबुद्ध फिल्मकारों में गिने जाते हैं। वह करीब एक दर्जन फिल्में बना चुके हैं और अब अपनी अगली फिल्म 'हलाला लव स्टोरी' की तैयारियों में जुटे हैं।

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'वायरस' की तरह हॉलीवुड की 'कंटेजन' भी संक्रमण के माहौल में इंसान की घुटन, बेबसी, बदहवासी और चिंताओं को बड़ी संजीदगी तथा संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारती है। निर्देशक स्टीवन सोडरबर्ग की इस एक्शन-थ्रिलर में तेजी से घूमती घटनाएं दर्शकों को बांधे रखती हैं। फिल्म में महामारी का जो माहौल रचा गया, आज दुनिया काफी कुछ उसी माहौल से जूझ रही है। फिल्म बताती है कि संक्रमण काल में किस तरह संक्रमित लोग ही नहीं, दरवाजों के हैंडल, टेबल काउंटर, क्रॉकरी और डेबिट कार्ड तक खतरनाक हो जाते हैं। फिल्म में मौतों के सिलसिले के बीच संक्रमण को लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां फैलती हैं (इन दिनों कोरोना को लेकर भी यही हो रहा है)। सरकार, डॉक्टर और वैज्ञानिक इन खतरों से कैसे निपटते हैं, यह 'कंटेजन' की आगे की रीलों का किस्सा है। कसी हुई पटकथा वाली यह फिल्म गैर-जरूरी ड्रामेबाजी से बचते हुए रील-दर-रील 'टू द प्वॉइंट' बात करती है। धारदार संवाद भी इसकी जान हैं। एक सीन में एक डॉक्टर जब कहता है- 'हम वायरस को पहचानें, उससे कहीं ज्यादा तेजी से वायरस हमें पहचान रहा है' तो उसकी बेबसी समझी जा सकती है। यह बेबसी और सघन होती है, जब दूसरा डॉक्टर कहता है- 'इस वायरस के लिए हमारे पास न वेक्सीन है, न ही ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल।' आज दुनियाभर के डॉक्टर इसी बेबसी पर सिर खपा रहे हैं।