नसीरुद्दीन शाह की 'हाफ फुल' ओटीटी पर आज से, इमेज के हर दायरे से दूर

By: पवन राणा
| Published: 15 Apr 2020, 08:08 PM IST
नसीरुद्दीन शाह की 'हाफ फुल' ओटीटी पर आज से, इमेज के हर दायरे से दूर
नसीरुद्दीन शाह की 'हाफ फुल' ओटीटी पर आज से, इमेज के हर दायरे से दूर

पिछले साल लॉस एंजिल्स में हुए शॉर्ट फिल्मों के समारोह में पुरस्कार जीत चुकी इस फिल्म का डिजिटल प्रीमियर इसी हफ्ते ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म जी 5 पर किया जाएगा।

-दिनेश ठाकुर
उत्तर प्रदेश के एक जमींदार घराने में पैदा हुए नसीरुद्दीन शाह को 1984 के वेनिस फिल्म समारोह में उस किरदार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा गया, जो जमींदारों के शोषण से त्रस्त एक गरीब हरिजन का था। फिल्म थी गौतम घोष की 'पार', जिसमें शबाना आजमी उनकी नायिका थीं। नसीरुद्दीन शाह को यह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिलना भारतीय सिनेमा के लिए गौरव की बात थी, क्योंकि इससे पहले यूरोप के तीनों प्रमुख फिल्म समारोह (कान, वेनिस, बर्लिन) में किसी भारतीय अभिनेता को पुरस्कार नहीं मिला था।

मधुर जाफरी को 1972 में 'शेक्सपियर वाला' के लिए बर्लिन फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया था। तीन बार नेशनल और तीन बार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीत चुके नसीरुद्दीन शाह पर वेनिस वाले भले 1984 में मेहरबान हुए हों, इससे काफी पहले वे 'मंथन', भूमिका, 'जुनून', 'स्पर्श', 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है', भवनी भवई, 'चक्र', 'बाजार' और 'जाने भी दो यारों' जैसी जाने कितनी फिल्मों से दुनिया में अपनी लाजवाब अदाकारी का सिक्का जमा चुके थे। वे अपने चेहरे पर हर किस्म के किरदार का नकाब बखूबी पहनने में माहिर हैं। चाहे किरदार वकील का हो (आक्रोश), युवती को बंधक बनाने वाले लम्पट का (निशांत), मक्कार पंडित का (गोधूलि), शराबी पुलिस इंस्पेक्टर का (अर्धसत्य) या सनकी सूबेदार (मिर्च मसाला) का, नसीरुद्दीन शाह हर रंग में पर्दे पर छा गए। दरअसल, उन्होंने शुरू से कथानक प्रधान के साथ-साथ किरदार प्रधान फिल्मों को तरजीह दी और किसी खास इमेज में बंधने से परहेज किया।

एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था कि उन्हें इमेज नाम की चीज से नफरत है, क्योंकि इसके चक्कर में अभिनेता खुद को सीमित दायरे में बांध लेता है। शायद इसीलिए 'मासूम', कर्मा, गुलामी, 'जलवा' और 'विश्वात्मा' जैसी मसाला फिल्मों में भी लोग उनके अभिनय की व्यापक रेंज से रू-ब-रू हुए। यह व्यापकता 71 साल की उम्र में भी बरकरार है। उनकी पिछली फिल्म 'द ताशकंद फाइल्स' पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मौत की जांच-पड़ताल के बारे में थी। कुछ समय से उनका झुकाव शॉर्ट फिल्मों की तरफ भी बढ़ा है। 'रोगन जोश', 'द वॉलेट' और 'इंटीरियर कैफे नाइट' के बाद इन दिनों उनकी शॉर्ट फिल्म 'हाफ फुल' सुर्खियों में है। पिछले साल लॉस एंजिल्स में हुए शॉर्ट फिल्मों के समारोह में पुरस्कार जीत चुकी इस फिल्म का डिजिटल प्रीमियर इसी हफ्ते ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म जी 5 पर किया जाएगा। जी 5 पर 15 अप्रेल से शॉर्ट फिल्म उत्सव शुरू हो रहा है। इसमें 'हाफ फुल' समेत नौ शॉर्ट फिल्में दिखाई जाएंगी। इनमें 'हार्टबीट', स्ट्रॉबेरी शेक, 'स्वाह', 'सेकेंड हैंड', 'बूम बूम', 'सो बी इट', 'फूड फॉर थॉट' और 'हाउ एबाउट ए किस' शामिल हैं।

नसीरुद्दीन शाह का कहना है कि ऐसे दौर में जब लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में कैद हैं, 'हाफ फुल' उम्मीद के उजाले के समान है। करण कवल के निर्देशन में बनी इस फिल्म में एक हताश युवक (विक्रम मैसी) की कहानी है, जिंदगी और मौत के प्रति जिसका नजरिया एक बुजुर्ग (नसीरुद्दीन शाह) से मिलने के बाद बदल जाता है। याद आता है कि हॉलीवुड में भी 'हाफ फुल' नाम से 6.25 मिनट की शॉर्ट फिल्म बन चुकी है। उसकी थीम भी कुछ-कुछ यही थी कि जिंदगी में अगर कुछ आधा खाली है, इसका मतलब वह आधा भरा हुआ है। खाली की फिक्र में घुलने के बजाय इंसान को भरे हुए हिस्से पर सब्र करना चाहिए। जैसा कि अमजद इस्लाम अमजद ने कहा है- 'कहां आके रुकने थे रास्ते, कहां मोड़ था उसे भूल जा/ वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा।'

Naseeruddin Shah