गोवा समारोह में कोई हिन्दी फिल्म स्वर्ण मयूर की दावेदार नहीं

By: पवन राणा
| Published: 11 Jan 2021, 10:24 PM IST
गोवा समारोह में कोई हिन्दी फिल्म स्वर्ण मयूर की दावेदार नहीं

  • प्रतियोगिता वर्ग के लिए चुनी गईं गैर-हिन्दी भाषी तीन भारतीय फिल्में
  • 15 फिल्मों के बीच होगा सर्वोच्च सम्मान के लिए मुकाबला
  • हिन्दी में प्रयोगवादी के बजाय फार्मूला फिल्में बनाने पर ज्यादा जोर

-दिनेश ठाकुर

क्या भारत में पिछले दो साल के दौरान हिन्दी में एक भी ऐसी सलीकेदार फिल्म नहीं बनी, जिसे दुनिया की चंद अच्छी फिल्मों से मुकाबले के लिए खड़ा किया जा सके? शायद नहीं बनी। गोवा में 16 जनवरी से शुरू हो रहे भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के प्रतियोगिता वर्ग के लिए चुनी गईं 15 फिल्मों में हिन्दी की कोई फिल्म नहीं है। समारोह के भारतीय पैनोरमा में जरूर दो हिन्दी फिल्में 'आवर्तन' और 'सांड की आंख' शामिल की गई हैं। इन्हें प्रतियोगिता वर्ग के लायक नहीं समझा गया। इस वर्ग में भारत की नुमाइंदगी तमिल की 'थाएन', असमी 'ब्रिज' और छत्तीसगढ़ी 'ए डोग एंड हिज मैन' करेंगी।

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प्रतियोगिता वर्ग की फिल्में
कान फिल्म समारोह के गोल्डन पाम और वेनिस समारोह के गोल्डन लॉयन अवॉर्ड की तरह भारत के समारोह में स्वर्ण मयूर सर्वोच्च सम्मान है। यह प्रतियोगिता वर्ग की किसी फिल्म के हिस्से आता है। इस बार तीन गैर-हिन्दी भाषी भारतीय फिल्मों का मुकाबला जिन विलायती फिल्मों से है, उनमें फ्रांस की 'माय बेस्ट फ्रेंड', डेनमार्क की 'इनटू द डार्कनेस', पोलैंड की 'आइ नेवर क्राय', दक्षिण कोरिया की 'लाइट फोर द यूथ', स्पेन की 'रेड मून टाइड', ईरान की 'ड्रीम्स ऑफ सोहराब', ताइवान की 'द साइलेंट फोरेस्ट' और पुर्तगाल की 'द डोमेन' शामिल हैं। प्रतियोगिता वर्ग की 15 फिल्मों का चयन अर्जेन्टीना के फिल्मकार पाब्लो सीजर की अगुवाई वाली ज्यूरी ने किया है। इसके बाकी चार सदस्यों में भारतीय फिल्मकार प्रियदर्शन शामिल हैं।


नई कहानियों में दिलचस्पी नहीं
प्रतियोगिता वर्ग के लिए ऐसी फिल्म चुनी जाती है, जिसके कथ्य में ताजगी हो और इसे सलीके से पर्दे पर उतारा गया हो। अफसोस की बात है कि दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले भारत की राष्ट्रीय भाषा हिन्दी में ऐसी फिल्में नहीं बन रही हैं, जो इस कसौटी पर खरी उतरें। मुख्यधारा के ज्यादातर फिल्मकारों का अलग ही हिसाब-किताब है। वे नए प्रयोग के जोखिम से बचते हैं। उन्हें कारोबारी कामयाबी के छोटे और आसान रास्ते ज्यादा लुभाते हैं। आजमाई हुई कहानियां और मसाले बार-बार दोहराए जाते हैं। रीमेक का बढ़ता चलन भी संकेत देता है कि नई कहानियों में फिल्मकारों की ज्यादा दिलचस्पी नहीं है।


हवा हुआ समानांतर सिनेमा का दौर
दूसरे विश्व युद्ध के बाद इटली में जिस नव यथार्थवादी सिनेमा का सूरज उगा था, उसकी किरणें धीरे-धीरे अमरीका, जर्मनी, फ्रांस और जापान के साथ भारत भी पहुंची थीं। सत्तर के दशक में मृणाल सेन, मणि कौल, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, कुमार शहानी, सईद मिर्जा, एम.एस. सथ्यू, गिरीश कर्नाड आदि ने कई ऐसी फिल्में बनाईं, जिनका झुकाव कारोबार की तरफ कम, कला की तरफ ज्यादा था। इन फिल्मों में नए कथ्य होते थे। हर फ्रेम में भारतीय जन-जीवन झलकता था। इनसे देश में एक अलग तरह की सिनेमा-संस्कृति विकसित हुई थी। दरअसल, समानांतर सिनेमा आंदोलन कमजोर पडऩे के बाद हिन्दी में प्रयोगवादी फिल्मों का सिलसिला थम-सा गया है। अब 'सारा आकाश', 'चक्र', 'अर्धसत्य' या 'मंडी' जैसी फिल्में बनाने का जुनून और जोश दूर-दूर तक नजर नहीं आता।