बॉलीवुड में फिर छाया मातम, नहीं रहें आवाज के जादूगर

By: भूप सिंह
| Published: 24 May 2020, 10:09 PM IST
बॉलीवुड में फिर छाया मातम, नहीं रहें आवाज के जादूगर
radio ceylon host gopal sharma passed away at 88

'भारत के पहले रेडियो जॉकी का निधन, 88 साल की उम्र में ली अंतिम सांस.....

बीते दौर के मशहूर उद्घोषक गोपाल शर्मा नहीं रहे। अपने मुम्बई के मकान में शुक्रवार को उन्होंने आखिरी सांस ली। वे 88 साल के थे। सत्तर के दशक तक, जब रेडियो ही देश-दुनिया से जोड़ने वाला जरिया था, कुछ आवाजें घर-घर पहचानी जाती थीं-गोपाल शर्मा, देवकीनंदन पांडे, अमीन सयानी और अशोक वाजपेयी। सबका अपना अलहदा अंदाज था। गोपाल शर्मा का शीशे-सा साफ उच्चारण, आवाज का उतार-चढ़ाव और खास अंदाज में 'आवाज की दुनिया के दोस्तो' बोलने में गजब का आकर्षण था। यह जुमला उनकी पहचान बन गया और 2007 में आई उनकी आत्मकथा का नाम भी यही रखा गया। वैसे उनकी आवाज में 'बंधुवर', 'फिल्मोनिया' और 'शुभरात्रि' सुनकर भी महसूस होता था कि किसी शब्द को गूंज में कैसे बदला जाता है।

गोपाल शर्मा की आवाज की गूंज का सफर 1956 में रेडियो सीलोन (श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन) से शुरू हुआ था। वे 1967 तक इस प्रसारण सेवा के हिन्दी विभाग के प्रमुख रहे। इस दौरान उनकी आवाज वाले कार्यक्रमों ने लोगों को दीवाना बना रखा था। फिल्मों और संगीत की गहन जानकारी के कारण लता मंगेशकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद और आशा भौसले जैसी हस्तियां उनके प्रशंसकों में शामिल थीं। एक बार राज कपूर ने उनसे कहा था- 'आप फिल्म संगीत पर इतनी रिसर्च का वक्त कैसे जुटा लेते हैं? आप जिस तरह गीत-संगीत का ब्योरा देते हैं, मैं हैरान रह जाता हूं।' रेडियो सीलोन को 11 साल की सेवाओं के बाद गोपाल शर्मा विविध भारती से जुड़े और यहां भी उनकी आवाज में लोकप्रिय कार्यक्रमों के झरने फूटते रहे। यह सिलसिला 2000 तक जारी रहा। जब कभी रेडियो के 'कल और आज', 'एक और अनेक बदलते हुए साथी' तथा 'मेरी पसंद के गीत' का जिक्र होगा, गोपाल शर्मा की आवाज के जलवे याद आएंगे।

फिल्म संगीत के इनसाइक्लोपीडिया गोपाल शर्मा को लता मंगेशकर की आवाज वाली एक गजल बेहद पसंद थी, जो उन्होंने नसीम बानो (सायरा बानो की मां) की फिल्म 'बागी' (1953) के लिए गाई थी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा था कि उनके देहांत पर यह गजल बजाई जाए। उनके परिजनों ने यह ख्वाहिश पूरी की। उनके अंतिम संस्कार से पहले यह गजल फिजा में गूंज उठी-'हमारे बाद महफिल में अब अफसाने बयां होंगे/बहारें हमको ढूंढेंगी, न जाने हम कहां होंगे/ न हम होंगे, न तुम होगे, न दिल होगा मगर फिर भी/हजारों मंजिलें होंगी, हजारों कारवां होंगे।'

Show More