शमशाद बेगम ने अब्बा की शर्त के चलते 30 साल तक बुर्के के पीछे छिपाए रखा अपना चेहरा

By: पवन राणा
| Published: 23 Apr 2020, 07:29 PM IST
शमशाद बेगम ने अब्बा की शर्त के चलते 30 साल तक बुर्के के पीछे छिपाए रखा अपना चेहरा
शमशाद बेगम ने अब्बा की शर्त के चलते 30 साल तक बुर्के के पीछे छिपाए रखा अपना चेहरा

— कभी शमशाद बेगम के गानों पर झूम-झूम जाता था जमाना
— 13 की उम्र में प्रेमी गणपत लाल बट्टू से शादी कर शमशाद ने रूढ़ीवादी परिवार से की बगावत

हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर की प्रमुख गायिकाओं में गिनी जाने वालीं शमशाद बेगम के बारे यह जानकर आज की पीढ़ी को हैरानी हो सकती है कि करीब 30 साल तक जमाना उनके दर्जनों हिट गानों पर झूमता रहा, लेकिन उनका चेहरा दुनिया के सामने नहीं आया। तेरह साल की उम्र में प्रेमी गणपत लाल बट्टू से शादी कर शमशाद ने अपने रूढ़ीवादी परिवार से पहली बगावत की थी। जब फिल्मी दुनिया में जाने की ठानकर उन्होंने दूसरी बगावत का बिगुल बजाया तो उनके अब्बा ने शर्त रख दी कि वे बुर्का पहनकर गाएंगी और फोटो नहीं खिंचवाएंगी। लिहाजा 40 से 60 के दशक तक, जब उनके हिट गानों की झड़ी लगी हुई थी, उन्होंने गाते समय फोटो नहीं खिंचवाई और प्रचार के लिए अपने फोटो छपवाने से भी परहेज किया।

संगीतकार भी दीवाने थे खुली-खुली आवाज के
शमशाद बेगम हर मूड, हर रंग के गानों में जान डाल देती थीं। चाहे वह शोखी भरा 'लेके पहला-पहला प्यार' (सीआईडी) हो, दर्द में डूबा 'बड़ी मुश्किल से दिल की बेकरारी को करार आया'(नगमा) या धूम-धड़ाके वाला 'रेशमी सलवार कुर्ता जाली का' (नया दौर)। गुलाम हैदर, एस.डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, नौशाद और ओ.पी. नैयर समेत उस दौर के कई बड़े संगीतकार उनकी आवाज के दीवाने थे।

सदाबहार गाने बेशुमार
शमशाद के बेशुमार सदाबहार गानों में 'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' (सीआईडी), कभी आर कभी पारलागा तीरे-नजर (आर-पार), ओ गाड़ीवाले गाड़ी धीरे हांक रे (मदर इंडिया), मेरे पिया गए रंगून (पतंगा), छोड़ बाबुल का घर (बाबुल), कजरा मोहब्बत वाला (किस्मत), दूर कोई गाए (बैजू बावरा), न बोल पी पी मोरे अंगना (दुलारी) और 'एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन' (आवारा) शामिल हैं।

90 साल की उम्र में पद्मभूषण
सत्तर के दशक में फिल्मों से दूर होने के बाद जमाने ने शमशाद बेगम को भुला दिया। कई साल बाद 2009 में, जब वे 90 साल की थीं, भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया। मुम्बई में 23 अप्रेल, 2013 को उनकी जिंदगी का सफर थम गया। उनकी याद में चार साल पहले डाक टिकट जारी किया गया था।