'शोले' को हुए 45 साल: इंडस्ट्री के लोगों ने उड़ाया था फिल्म का मजाक, एक खेमे ने बताया था 'ठंडे छोले'

By: पवन राणा
| Published: 17 Aug 2020, 11:46 PM IST
'शोले' को हुए 45 साल: इंडस्ट्री के लोगों ने उड़ाया था फिल्म का मजाक, एक खेमे ने बताया था 'ठंडे छोले'
'शोले' को हुए 45 साल: इंडस्ट्री के लोगों ने उड़ाया था फिल्म का मजाक, एक खेमे ने बताया था 'ठंडे छोले'

इंडस्ट्री के एक खेमे ने 'शोले' को 'ठंडे छोले' बताकर फिल्म का उपहास उड़ाया। इस खेमे का कहना था कि गब्बर सिंह (अमजद खान) फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। प्रदर्शन के पहले दिन मिनर्वा को छोड़ मुम्बई के बाकी सिनेमाघरों में भीड़ नहीं उमड़ी तो फिल्म के निर्माता जी.पी. सिप्पी (रमेश सिप्पी के पिता) की चिंता और बढ़ गई।

मुंबई। इस बार स्वाधीनता दिवस पर रमेश सिप्पी की 'शोले' ने 45 साल पूरे कर लिए। डाकुओं के आतंक और बदले के फार्मूले वाली यह क्लासिक फिल्म 15 अगस्त, 1975 को सिनेमाघरों में उतारी गई थी। इसके रेकॉर्ड तोड़ कारोबार के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन यह कम लोगों को पता होगा कि इसके प्रदर्शन की शुरुआती रिपोर्ट ने रमेश सिप्पी और उनकी टीम की नींद उड़ा दी थी। इस टीम की चिंता 14 अगस्त को मुम्बई के मिनर्वा सिनेमाघर में 'शोले' के प्रीमियर से ही शुरू हो गई थी। उस समय मिनर्वा 70 एमएम पर्दे और सिक्स ट्रैक साउंड वाला देश का एकमात्र सिनेमाघर था। प्रीमियर के बाद इंडस्ट्री की हस्तियों, ट्रेड पंडितों और समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं जोश ठंडा करने वाली थीं। ज्यादातर का कहना था कि फिल्म में कुछ भी खास नहीं है। कुछ ने इसे 'मेरा गांव मेरा देश' का कमजोर संस्करण बताया। समीक्षाएं पढऩे के बाद रमेश सिप्पी को लगा था कि 'शोले' घाटे का सौदा साबित हो सकती है।

दिलीप कुमार और राज कपूर को फिल्म पसंद आई। राज कपूर का कहना था कि इसमें थोड़ा और रोमांस होना चाहिए था। राजेंद्र कुमार की शिकायत थी कि फिल्म में मां का किरदार नहीं है और जय-वीरू की दोस्ती अजीब तरह से दिखाई गई है। इंडस्ट्री के एक खेमे ने 'ठंडे छोले' बताकर फिल्म का उपहास उड़ाया। इस खेमे का कहना था कि गब्बर सिंह (अमजद खान) फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। प्रदर्शन के पहले दिन मिनर्वा को छोड़ मुम्बई के बाकी सिनेमाघरों में भीड़ नहीं उमड़ी तो फिल्म के निर्माता जी.पी. सिप्पी (रमेश सिप्पी के पिता) की चिंता और बढ़ गई। उन दिनों मुम्बई में मूसलाधार बारिश हो रही थी। तीन दिन बाद ज्यादातर सिनेमाघरों में 'शोले' का कारोबार 50 फीसदी से कम रहा।


दूसरी तरफ इसी के साथ 15 अगस्त को सिनेमाघरों में उतारी गई छोटे बजट की धार्मिक फिल्म 'जय संतोषी मां' में भीड़ बढ़ती जा रही थी। 'शोले' के कई वितरक शिकायत कर रहे थे कि फिल्म काफी लम्बी है। इन शिकायतों को लेकर रमेश सिप्पी फिल्म को दोबारा संपादित करने पर विचार कर रहे थे कि दूसरे हफ्ते के दौरान मुम्बई के सिनेमाघरों में 'शोले' देखने वालों की भीड़ उमडऩे लगी। भीड़ में कई ऐसे लोग भी थे, जो पहले हफ्ते ही फिल्म देख चुके थे। माउथ पब्लिसिटी के दम पर दिन-ब-दिन 'शोले' चुम्बक में तब्दील होती गई। आगे जो हुआ, वह ऐसा सुनहरा इतिहास है, जिसे लिखने का सपना हर फिल्मकार देखता है। मिनर्वा सिनेमाघर में यह फिल्म पांच साल से ज्यादा चली।

इंटरनेट पर आज भी लोकप्रिय
सिनेमाघरों के बाद 'शोले' वीडियो और सीडी बाजार में छाई रही। अब यह इंटरनेट पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्मों में शामिल है। इसके निर्माता जी.पी. सिप्पी ने एक बार कहा था कि दुनियाभर में जितने लोग 'शोले' देख चुके हैं, उनका आंकड़ा जुटाया जाए तो यह शायद भारत की आबादी से भी ज्यादा होगा।

Dharmendra
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