कई बार टूटा है फिल्मी कलाकारों का हौसला, रोशनी के पीछे की तल्खियां

By: पवन राणा
| Updated: 18 Jun 2020, 11:37 PM IST
कई बार टूटा है फिल्मी कलाकारों का हौसला, रोशनी के पीछे की तल्खियां
sushant singh rajput

चंबल के डाकुओं की पृष्ठभूमि वाली 'सोनचिडिय़ा' ( Sonchiriya Movie ) में सुशांत सिंह ( Sushant Singh Rajput ) डाकू के किरदार में थे। इस फिल्म के एक सीन में साथी डाकू (मनोज वाजपेयी) उनसे पूछता है कि क्या उन्हें मरने से डर लग रहा है तो वे कहते हैं- 'एक जन्म निकल गया इन बीहड़ों में, अब मरने से काहे डरेंगे।'

-दिनेश ठाकुर

चंबल के डाकुओं की पृष्ठभूमि वाली 'सोनचिडिय़ा' ( Sonchiriya Movie ) में सुशांत सिंह ( Sushant Singh Rajput ) डाकू के किरदार में थे। इस फिल्म के एक सीन में साथी डाकू (मनोज वाजपेयी) उनसे पूछता है कि क्या उन्हें मरने से डर लग रहा है तो वे कहते हैं- 'एक जन्म निकल गया इन बीहड़ों में, अब मरने से काहे डरेंगे।' जिंदगी में भी कभी-कभी बीहड़ों जैसे दुर्गम रास्ते आते हैं। उन्हें हौसले और हिम्मत से पार किया जा सकता है। सुशांत सिंह इस मोर्चे पर क्यों हार गए? ऐसा कौन-सा दुर्गम रास्ता था, जो वे पार नहीं कर पा रहे थे? उस अनमोल जिंदगी को उन्होंने क्यों ठुकरा दिया, जो जाने कितनी प्रार्थनाओं और पुण्य कर्मों से हासिल होती है? हैरानी होती है कि जिस फिल्मी दुनिया में 'राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है, दुख तो अपना साथी है' और 'जीवन चलने का नाम चलते रहो सुबहो-शाम' जैसे हौसला देने वाले गीत रचे जाते हैं, उसी के कुछ कलाकारों का हौसला इतना कमजोर क्यों होता है, जो किसी दुख को बर्दाश्त करने के बजाय शीशे की तरह टूट जाता है।

सिनेमा वालों का हौसला टूटने का सिलसिला गुरुदत्त के जमाने से चल रहा है। कभी सिल्क स्मिता का टूटता है, कभी जिया खान का तो कभी सुशांत सिंह राजपूत का। चिराग तले अंधेरा शायद इसी को कहते हैं। फिल्मों में जो चकाचौंध दिखाई जाती है, इसके कलाकारों की जिंदगी में तनाव का घनत्व और अंधेरे उसी अनुपात में फैले रहते हैं। फिल्में ही क्यों, दूसरे कई क्षेत्रों में भी इसी तरह का तनाव है। जिंदगी इसी का नाम है कि तनाव को दूर करने के रास्ते खुद खोजे जाएं। विपरीत हालात में भी अपने दिल-दिमाग को स्थिर रखा जाए। सुशांत सिंह के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं था। सौ करोड़ रुपए का कारोबार करने वाली महेंद्र सिंह धोनी की बायोपिक के अलावा 'काय पो छे', 'पीके', 'केदारनाथ' और 'छिछोरे' जैसी फिल्मों ने उन्हें तेजी से उभरता सितारा बना दिया था। वे खुद को ज्यादा से ज्यादा कामकाज में व्यस्त रखकर अपनी निजी परेशानियों से दूर हो सकते थे। एक अच्छे कलाकार को मजबूत इरादों वाला इंसान भी होना चाहिए, क्योंकि वह कई लोगों का प्रेरणा स्रोत होता है। अगर वह इस तरह जीवन से पलायन का रास्ता चुनता है तो समाज में गलत संदेश जाता है।

हरेक के जीवन के साथ जाने कितनों के जीवन की डोर जुड़ी होती है- परिजन, रिश्तेदार, संगी-साथी। अफसोस की बात है कि जिस सिनेमा से 'अपने लिए जिए, जिए तो क्या जिए, तू जी ए दिल जमाने के लिए' जैसे आदर्श मुखरित होते हैं, उसी के एक सदस्य सुशांत सिंह आत्मघाती कदम उठाकर अपनी जिंदगी पर पूर्णविराम लगा देते हैं और खुद से जुड़े जाने कितने लोगों को उम्रभर का दर्द दे जाते हैं।

Manoj Bajpai