'Ghayal' और 'Dil' के 30 साल पूरे: एक ही दिन सिनेमाघरों में पहुंची दोनों फिल्मों पर हुई थी धन-वर्षा

By: पवन राणा
| Updated: 08 Oct 2020, 03:38 PM IST
'Ghayal' और 'Dil' के 30 साल पूरे: एक ही दिन सिनेमाघरों में पहुंची दोनों फिल्मों पर हुई थी धन-वर्षा
'Ghyal' और 'Dil' के 30 साल पूरे: एक ही दिन सिनेमाघरों में पहुंची दोनों फिल्मों पर हुई थी धन-वर्षा

सनी देओल स्टारर ( Sunny Deol ) 'घायल' ( Ghayal Movie ) ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता समेत सात फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते, जबकि 'दिल' ( Dil Movie ) के लिए माधुरी दीक्षित ( Madhuri Dixit ) ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवॉर्ड जीता। 'घायल' अगर पूरी तरह सनी देओल के कंधों पर टिकी थी, तो 'दिल' का सबसे बड़ा सहारा उसका लोकप्रिय संगीत था।

-दिनेश ठाकुर

एक दौर था, जब दो बड़ी फिल्मों को एक साथ सिनेमाघरों में उतारने से बचा जाता था। उन दिनों मल्टीप्लेक्स नहीं थे। सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में नई फिल्म के पहले हफ्ते के कलेक्शंस पर कारोबारी पंडितों की नजरें टिकी रहती थीं। अगर फिल्म हफ्तेभर भीड़ जुटाने में कामयाब रहती, तो उसे लम्बी रेस का घोड़ा मानकर यह कोशिश की जाती कि अगले एक-दो हफ्ते कोई बड़ी फिल्म सिनेमाघरों में न भेजी जाए, ताकि पहली वाली फिल्म की कारोबारी दौड़ बाधित न हो। ऐसे में 1990 में दो बड़ी फिल्में 'घायल' ( Ghayal Movie ) और 'दिल' ( Dil Movie ) एक ही दिन सिनेमाघरों में पहुंचना कारोबारी पंडितों के लिए हैरानी की बात थी। यह हैरानी और बढ़ी, जब दोनों फिल्मों पर कई हफ्तों तक धन बरसता रहा। दोनों अलग-अलग प्रकृति की फिल्में थीं। आमिर खान ( Aamir Khan ) और माधुरी दीक्षित ( Madhuri Dixit ) की 'दिल' रोमांटिक कॉमेडी थी, तो सनी देओल ( Sunny Deol ) और मीनाक्षी शेषाद्रि ( Meenakshi Seshadri ) की 'घायल' एक्शन से लैस थी। उस साल सबसे ज्यादा कारोबार करने वाली दमदार दस फिल्मों की लिस्ट में 'दिल' पहले और 'घायल' दूसरे नंबर पर रही। अमिताभ बच्चन की 'आज का अर्जुन' तीसरे नंबर पर थी।

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पहली फिल्म 'बेताब' के बाद लगातार लडख़ड़ा रहे सनी देओल के कॅरियर के लिए 'घायल' उसी तरह नया मोड़ साबित हुई, जिस तरह 1973 में 'जंजीर' ने अमिताभ बच्चन को एंग्री यंगमैन का नया अवतार दिया था। 'बेताब' के दो साल बाद आई 'अर्जुन' अच्छी एक्शन फिल्म थी, लेकिन इससे सनी देओल को खास फायदा नहीं हुआ। उनकी ऊर्जा 'सल्तनत', 'सवेरे वाली गाड़ी', 'मजबूर', 'निगाहें', 'जबरदस्त', 'समुंदर', 'इंतकाम', 'वर्दी', 'जोशीले', 'आग का गोला' जैसी फिल्मों में खर्च होती रही। 'त्रिदेव' में उनके साथ दो और नायक (जैकी श्रॉफ, नसीरुद्दीन शाह) थे, तो 'चालबाज' पूरी तरह श्रीदेवी की फिल्म थी। इसमें रजनीकांत की मौजूदगी ने भी उन्हें ज्यादा उभरने का मौका नहीं दिया।

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'घायल' निर्देशक राजकुमार संतोषी की पहली फिल्म थी। उन्होंने सनी देओल के आक्रोश को लावा बनाकर पर्दे पर उतारा और दोनों का जादू चल गया। 'उतार कर फेंक दो ये वर्दी और पहन लो बलवंत राय के नाम का पट्टा' जैसे संवाद की घन-गरज गोया मुनादी थी कि सनी देओल ने तालियां लूटने के गुर सीख लिए हैं। इसकी गूंज बाद में 'ये ढाई किलो का हाथ जब किसी पे पड़ता है, तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है' (दामिनी) से लेकर 'हमारा हिन्दुस्तान जिंदाबाद था, जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा' (गदर) तक लगातार तेज से तेजतर होती गई। 'घातक' और 'दामिनी' भी राजकुमार संतोषी की फिल्में हैं। 'घायल' के लिए सनी देओल ने पहली बार नेशनल अवॉर्ड जीता। संतोषी से अनबन के बाद उन्होंने इसका सीक्वल 'घायल वंस अगेन' अनिल मेहरा के निर्देशन में बनवाया। यह मूल फिल्म के आगे कहीं नहीं ठहरता।

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'घायल' ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता समेत सात फिल्मफेयर अवॉर्ड जीते, जबकि 'दिल' के लिए माधुरी दीक्षित ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का अवॉर्ड जीता। 'घायल' अगर पूरी तरह सनी देओल के कंधों पर टिकी थी, तो 'दिल' का सबसे बड़ा सहारा उसका लोकप्रिय संगीत था। उस जमाने में यह आलम था कि चाहे जिस गली-मोहल्ले से गुजरिए, इसके 'मुझे नींद न आए', 'हम प्यार करने वाले', 'हमने घर छोड़ा है' और 'खंबे जैसी खड़ी है' सुनाई दे जाते थे। पहले किसी फिल्म में इतने हिट गाने होते थे। अब किसी फिल्म का एक गाना ही हिट हो जाए, तो इसे लॉटरी खुलना माना जाता है।