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आधुनिकता का दंश, किसानों के सारथी हुए कम

आधुनिकता के इस दौर में किसानों के सारथी कहे जाने वाले बैलों की संख्या गांवों में धीरे धीरे कम हो रही। दशकों पहले जहां गांवों में सैकड़ों की तादाद में किसानों के पास बैल हुआ करते थे। आज दहाई का अंक भी मुश्किल से पूरा हो रहा।

बूंदी

Published: November 08, 2021 08:19:17 pm

आधुनिकता का दंश, किसानों के सारथी हुए कम
बैलों का मशीनरी ने लिया स्थान
गोठड़ा. आधुनिकता के इस दौर में किसानों के सारथी कहे जाने वाले बैलों की संख्या गांवों में धीरे धीरे कम हो रही। दशकों पहले जहां गांवों में सैकड़ों की तादाद में किसानों के पास बैल हुआ करते थे। आज दहाई का अंक भी मुश्किल से पूरा हो रहा। बैलों की कम होती संख्या के चलते किसान भी अब धीरे -धीरे खेती किसानी के लिए मशीनरी पर निर्भर हो गए।
बैलों से होते थे यह कार्य
ग्रामीण क्षेत्रों के किसान तीन दशक पहले बैलों से खेती किसानी का कार्य करते थे। जिनमें घर से बैलगाड़ी की सहायता से खेत तक पहुंचता था। बैलों से खेतों की हंकाई-जुताई, खेतों में बीज डालना, फसल पकने के बाद बैलों की मदद से फसल का गावटा करना, उपज को घर अथवा बाजार तक ले जाने के लिए, कुएं से पानी निकालना, शादियों में बारात को ले जाना आदि में बैलों की मदद ली जाती थी, लेकिन अब समय गुजरने के साथ ही बैलों से होने वाले सारे काम बीते जमाने की बात हो गई।
ट्रैक्टर से सस्ता बैल, मेहनत करें कौन
किसानों ने बताया कि लघु एवं सीमांत किसानों के लिए आज भी बैलों से खेती करना सस्ता एवं सुविधाजनक है। बैलों से ट्रैक्टर से भी अच्छी तरीके से हंकाई जुताई होती है, लेकिन वर्तमान का किसान मशीनरी उपकरणों पर निर्भर रहने से बैलों को धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। डीजल के दामों में वृद्धि होने के चलते ट्रैक्टरों से की जा रही खेती काफी महंगी हो गई।
पीढिय़ों से रखते आ रहे बैल
धोवड़ा निवासी किसान गोवर्धन लाल सैनी, रामलाल सैनी, गोठड़ा निवासी गोपी लाल सैनी ने बताया कि उनकी कई पीढिय़ों से खेती के कार्य के लिए बैलों को रखते आ रहे ह्यहंै। समय बदलने के कारण लोग ट्रैक्टर आदि पर निर्भर रहने से गांव में धीरे-धीरे बैलों की संख्या लगातार घट रही है।
सैकड़ों की तादाद में बैल, आज दहाई पर सिमटे
तीन दशक पहले हिण्डोली पंचायत क्षेत्र में 150, बड़ानयागांव में 100, चतरगंज में 125, गोठड़ा में 100, धोवड़ा में 125, मेण्डी में 50, रुणीजा में 50, ठीकरदा में 150, बड़ौदिया में 150, मांगलीकलां में 50, सहसपुरिया में 50 सहित कई गांवों में किसान बैलों की जोडिय़ां रखते थे। अब इनकी संख्या कई गुना घट गई।
& लघु एवं सीमांत किसान, काश्तकार के लिए बैलों से की जाने वाली खेती सस्ती एवं सुविधाजनक थी। हम सारा कार्य बैलों की मदद से ही करते हैं। किसानों को बैलों की सहायता से ही खेती करना चाहिए।
चेतराम सैनी, किसान, धोवडा

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