कारसेवा की यादें ताजा, चहुंओर उल्लास का माहौल

आखिर आज वो दिन आ ही गया जिस दिन की पीढिय़ों से बाट थी। अयोध्या में भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए बुधवार को आधारशिला रखी जाएगी।

By: pankaj joshi

Published: 05 Aug 2020, 05:43 PM IST

कारसेवा की यादें ताजा, चहुंओर उल्लास का माहौल
बूंदी. आखिर आज वो दिन आ ही गया जिस दिन की पीढिय़ों से बाट थी। अयोध्या में भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए बुधवार को आधारशिला रखी जाएगी। इस सच होते सपने ने बूंदी जिले के लोगों में अलग ही उल्लास और खुशी पैदा कर दी। दर्जनों लोगों के कार सेवा के संस्मरण ताजा हो गए। शायद ही कोई हिस्सा बचा हो जिस जगह से रामभक्त कार सेवा में नहीं गए हों या फिर राममंदिर निर्माण के लिए निकाली गई यात्राओं का हिस्सा नहीं बने हों। जिनका बचपन था वह आज युवा हो गए और जो युवा थे वे अंतिम पड़ाव की ओर पहुंच रहे, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की इस घड़ी ने चहुंओर उल्लास का माहौल बना दिया। लोगों को लग रहा शायद वह कल की ही बात थी। यह दिन हर किसी के जीवन मेंं खुशियोंं भरा रहेगा।
बूंदी के धार्मिक स्थलों की मिट्टी और पवित्र जल से भरेगी नींव
बूंदी. राम मंदिर की नींव में रखा जाने के लिए बूंदी जिले के पवित्र धार्मिक स्थल से मिट्टी एवं जल भेजा गया। बूंदी की बाणगंगा चौथ माता, टाइगर हिल स्थित मांधाता, रामेश्वर महादेव, रक्तदंतिका माता सथूर, गुरुद्वारा लंगर साहिब, कमलेश्वर महादेव, इंद्रगढ़ माता, राजराजेश्वर महादेव, मात्रा हनुमान मंदिर एवं भगवान केशव मंदिर से पवित्र मिट्टी अयोध्या भेजी गई। इस मिट्टी को आधारशिला रखने के दौरान नींव में रखा जाएगा। साथ ही चर्मण्यवती ‘चम्बल’ नदी, रामेश्वर महादेव के कुंड का पवित्र जल भी भेजा गया। विहिप ने यह सामग्री भीलवाड़ा हरिसेवा धाम आश्रम में भेजी, जहां से अयोध्या पहुंची।
यह जीवन की सबसे बड़ी खुशी होगी
बड़ाखेड़ा. क्षेत्र के कई गांवों से कार सेवक अयोध्या पहुंचे थे। उनमें माखीदा, देहीखेडा गांवों के कार सेवा में गए थे। देहीखेडा निवासी 75 वर्षीय हरिशंकर गोस्वामी ने बताया कि वह अयोध्या गए थे। आज सपना साकार होगा। यह जीवन की सबसे बड़ी खुशी होगी। देहीखेडा के पूर्व सरपंच खेमराज मीणा तब 22 साल के थे। तब कोई मोबाइल नहीं था और न्यूज चैनल सिर्फ दूरदर्शन था। या फिर अखबार के सहारे ही गांवों में सूचना पहुंची थी। मीणा ने बताया कि लाठीवार में घायलों को चिकित्सालय में पहुंचाया था।
मैं कभी नहीं भूल सकता
कार सेवक सोहन लाल शर्मा ने बताया कि 6 दिसम्बर का दिन कभी नहीं भूल सकता। उसदिन कार सेवकों के तौर पर अयोध्या में मौजूद था। अब भगवान राम के मंदिर निर्माण की तिथि को लेकर जीवन में खुशी छा गई।
पहली कारसेवा में दिल्ली से पैदल चलकर 12 दिन में पहुंचे अयोध्या
अयोध्या गए कारसेवकों की जुबानी
भण्डेड़ा. कस्बे के छोटूलाल जोशी ने बताया कि 1990 के दशक में नवम्बर माह की 20 तारीख को अयोध्या के लिए पहली कारसेवा रवाना हुई थी। साथ में कस्बे के बृजमोहन पुरोहित और बांसी गांव से बद्रीनाथ बाबा गए थे।
तहसील नैनवां पहुंचते ही 60 जने जत्थे में शामिल होकर सवाईमाधोपुर पहुंचे। जहां 30 जनों को पुलिस ने पकड़ लिया। शेष ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हो गए। दिल्ली पहुंचने से पहले ही ट्रेन को रोक लिया। कारसेवकों से पूछा तो उन्होंने जय श्रीराम का नारा लगाया तो वहीं गिरफ्तार कर लिया। कुछ कारसेवक कूदकर भाग गए। अयोध्या जाने के लिए कोई साधन नहीं था। ऐसे में पैदल जंगल के रास्ते निकल गए। अमेठी के निकट पुलिस ने रोक लिया। फिर 18 गाडियों में कारसेवकों को भरकर वापस 18 किलोमीटर पीछे छोड़ दिया। दूसरे दिन कारसेवक जज्बे के साथ फिर रवाना हो गए। ट्रेन की पटरियों का सहारा लेकर 14 कोसी परिक्रमा में पहुंचे। मठ में ठहराव किया। इस पहली कारसेवा में रात-दिन चलकर दिल्ली से पैदल चलकर 12 दिन में अयोध्या पहुंचे थे।
25 दिन जेलों में रहे थे रामभगत
लाखेरी. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बाबूलाल सेदावत ने बताया कि 1989 में मंदिर निर्माण के लिए शिला पूजन का कार्य इंद्रगढ तहसील के सौ गांवों में हुआ था। 1990 की कारसेवा में 42 कारसेवक गए थे। अवध एक्सप्रेस गाडी को बंद कर दिया था, जिससे कारसेवक मथुरा-दिल्ली के रास्ते प्रतापगढ़ की ट्रेन से अयोध्या के लिए रवाना हुए। बाराबांकी में 8 और बरेली में 30 कारसेवकों को गिरफ्तार कर लिया था। 4-5 कारसेवक जो बचे वो यूपी के प्रतापगढ़ जिले तक पहुंचे। इन कारसेवकों को 25 दिन बरेली जेल में रखा गया। कार सेवक बताते हैं कि तब जेलों में भी धार्मिक माहौल बना दिया था।
जेलर निकला स्वयं सेवक
गोठड़ा. 31 अक्टूबर 1990 को छाबडिय़ों का नयागांव निवासी 55 वर्षीय पूर्व सरपंच पोखर लाल नागर 125 जनों के जत्थे में शामिल होकर गए। मथुरा पहुंचते ही उन्हें 27 जनों को रेलवे स्टेशन पर ही गिरफ्तार कर लिया। कारसेवकों को नारोली थाने ले गए। उसके बाद 12 दिन के लिए एटा में बनाए गए अस्थाई जेल मेंं रखा। यहां संयोग से जो जेलर मिला वह स्वयंसेवक निकला। उन्होंने 12 दिन तक सभी लोगों को किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं आने दी।
हालातों को याद करके ही आंखें नम हो गई
झालीजी का बराना से कारसेवा में 20 अक्टूबर 1990 मेंं नौ जने गए थे। सभी 16 दिन आगरा सेन्ट्रल जेल मेंं बंद रहे। अब जब राममंदिर निर्माण शुरू होने का वक्त आया तो पुराने यादें ताजा हो गई। यही नहीं कारसेवकों के परिवारजनों की भी उस वक्त पैदा हुए हालातों को याद करके ही आंखें नम हो गई। 60 वर्षीय उर्मिला ने बताया कि पति कार सेवा मेंं गए थे। तब तीन मासूम बच्चों के साथ वह अकेली घर में रही। तब सूचना के कोई साधन नहीं थे। शाम को सिर्फ दूरदर्शन पर खबरें आती थी। गांव में गिने-चुने टीवी थे। उन्हीं पर खबरें सूनकर दिन गुजारे। कार सेवक कौन कहां जेल में बंद हो गया, इसकी कोई सूचनाएं नहीं आई। जब सारे सकुशल लौटे तो सुकून मिला।

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