आज भी मन्दिर का एक-एक खम्भा स्थापत्य कला का बेजोड़ प्रतीक

किसी भी शहर, कस्बा या गांव की बसावट का एक इतिहास होता है। वहां पर बने मन्दिर, बावडिय़ां, किले व तालाब ही वहां की बसावट के साक्षी माने जाते है। उसी प्रकार चौरासी खम्भों पर खड़ा नैनवां का चारभुजा मन्दिर चौरासी खेड़ों को मिलाकर बसाए गए नैनवां के इतिहास का जीवंत साक्षी भी है।

By: pankaj joshi

Published: 04 Oct 2021, 06:05 PM IST

आज भी मन्दिर का एक-एक खम्भा स्थापत्य कला का बेजोड़ प्रतीक
नैनवां. किसी भी शहर, कस्बा या गांव की बसावट का एक इतिहास होता है। वहां पर बने मन्दिर, बावडिय़ां, किले व तालाब ही वहां की बसावट के साक्षी माने जाते है। उसी प्रकार चौरासी खम्भों पर खड़ा नैनवां का चारभुजा मन्दिर चौरासी खेड़ों को मिलाकर बसाए गए नैनवां के इतिहास का जीवंत साक्षी भी है। रियासतकालीन किले व इमारतें जीर्ण-शीर्ण होते देखे है, लेकिन पांच सदी से वक्त के थपेड़ों की मार सहने के बाद भी नैनवां की बसावट व स्थापत्य कला का साक्षी बनकर ज्यों का त्यों खड़ा है। आज भी मन्दिर का एक-एक खम्भा स्थापत्य कला का बेजोड़ प्रतीक बना हुआ है। मन्दिर की बनावट टोडारायसिंह में स्थित मन्दिर से मिलती-जुलती है। बूंदी रियासत में राजकवि रहे नैनवां निवासी कुंजबिहारीलाल शर्मा की लिखी काव्य रचनाओं में इसका उल्लेख किया है। नाहर खानसिंह के शासनकाल में जिस तरह बावडिय़ों, महलों व बाग-बगीचों का निर्माण कराया, उसी तरह मन्दिरों के निर्माण में भी खासी रुचि दिखाई थी। मन्दिर का निर्माण भी 15वीं शताब्दी में किलेदार नाहर खानसिंह के शासनकाल में हुआ था। नाहर खानसिंह ने ही नैनवां के आसपास के 84 खेड़ों को मिलाकर नैनवां को दोबारा टाउन प्लानिंग के हिसाब से बसाया था। मन्दिर में एक खेड़ा का एक खम्भा स्थापित किया था।
खम्भों का आकार एक, दूरी भी बराबर
मन्दिर के तीन तरफ के खम्भों पर अब दीवारों का निर्माण हो चुका है। मन्दिर के चारों तरफ कलात्मक पत्थरों से निर्मित दीवारें भी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना बनी हुई है। सभी चौरासी खम्भें एक ही आकार के आठ फीट वर्गाकार की चौड़ाई तथा दस-दस फीट ऊंचाई के है। एक खम्भे से दूसरे खम्भे की दूरी भी आठ फीट है। जिनके ऊपर विशालकाय पत्थरों के लेंटर डले हुए है। चोकोर आकर में खम्भों पर खड़े मन्दिर के गर्भ गृह में पर कलात्मक पत्थरों का बीस फीट ऊंचा गुम्बद बना हुआ है। जिसके बाहर व अन्दर चहुंओर आज भी मुंह बोलती शिल्प कला सुरक्षित है। गुम्बद के मंडप में तराशा गया कलावृत का नमूनों के साथ विभिन्न प्रकार की शिल्प कला उकरी हुई है। यह शिल्प कला आज भी मुंह बोलती है।
यह भी साक्षी
15वीं शताब्दी में नैनवां में चारभुजा मन्दिर के अलावा अन्य मन्दिरों का भी निर्माण कराया था। गढ़ के दरवाजे के सामने दस फीट ऊंचाई पर बना केशवरायजी का मन्दिर, शीतला माता का मन्दिर, गढ़चौक में स्थित माताजी का मन्दिर के साथ बड़े तालाब के किनारे स्थित कंवरजी की छतरियां भी धार्मिक पुरामहत्व के प्रतीक हैं, जो भी ज्यों के त्यों खड़े है।
एक ही चौपड़, बाकी में तिरछापन
नैनवां की बसावट में कस्बे की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा गया। परकोटे की हर गली में चौराहा तो बनाया, लेकिन चौराहा से गलियों का रास्ता तिरछा रखा गया। कोई गली आमने-सामने नहीं रखी गई। लोहड़ी चौहटी, चार हाटडिय़ा की गली, दपोला, मालदेव की गली, मारवाड़ा गली, राजघाट गली, खारिया कुआं की गली, देईपोल, टोडपोल, खानपोल, राजघाट, होलीखूंट के स्थानों पर गलियों का निर्माण इसी तरह से हो रहा है। सिर्फ कस्बे में सिर्फ सदर बाजार में झण्डी की गली पर ही चौराहा का आकार दिया गया।

pankaj joshi Photographer
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned