BUNDI : तनाव से हार रही जिंदगी, 24 दिनों में 7 जनों ने कर लिया सुसाइड

बूंदी जिले में लगातार बढ़ रहे लगातार बढ़ रहे आत्महत्या के मामले, युवाओं की संख्या सर्वाधिक

By: Nagesh Sharma

Published: 25 Sep 2021, 05:33 PM IST

बूंदी. बूंदी जिले में अचानक सुसाइड के मामले में बढ़ गए। अकेले सितम्बर माह के 24 दिनों में ही 7 जनों ने सुसाइड कर जीवन लीला समाप्त कर ली। इनमें 6 जने फंदे पर झूले और 1 ने विषाख्त खा लिया। यानी हर चौथे दिन एक जने ने सुसाइड किया है। सुसाइड करने वालों में अधिकतर संख्या युवाओं की होने से यह संकेत बूंदी जिले के लिए ठीक नहीं है। अगस्त माह में भी 4 जनों ने सुसाइड किया, जिनमें 3 फंदे पर झूल गए। कमोबेश यह हालात बीते छह माह में अधिक बिगड़े हैं। अप्रेल माह में भी 4 जनों ने सुसाइड किया था। आत्म की यह घटनाएं स्तब्ध करने वाली है। लेकिन जिंदगी जीने के लिए हैं। हार कर मर जाने के लिए नहीं।

बात-बात पर सुसाइड की धमकी
युवाओं में धीरे-धीरे सहन शक्ति कम हो रही। इसी का परिणाम मानें की बात-बात पर सुसाइड करने की धमकियां दे बैठते हैं।
प्रेम प्रसंग भी एक कारण
आत्महत्या में प्रेमप्रसंग भी एक कारण है। आत्महत्या के बाद सुसाइड नोट में इसका खुलासा होता है। बूंदी के निकट कोटा-चित्तौड़ रेल लाइन पर 26 अगस्त को एक 26 वर्षीय युवक ने रेल के आगे कटकर आत्महत्या कर ली थी। जिसमें सुसाइड की वजह प्रेमप्रसंग निकला।

केस - 1
2 सितम्बर को माखीदा रोड पर इटावा के श्योपुर निवासी 22 साल का युवक हनुमान फंदे पर झूला मिला। वह पिता से कासुनी के बाद घर से निकला था।
केस - 2
12 सितम्बर को नैनवां क्षेत्र के ताकला बंजारा के झोंपड़ा में 30 वर्ष के कैलाश ने फंदे पर झूलकर आत्महत्या कर ली। उसके पीछे पत्नी और दो मासूम बच्चे रह गए।
केस - 3
11 सितम्बर को इंद्रगढ़ क्षेत्र से निकल रहे हाई-वे पर स्थित फाइनेंस के ऑफिस में 33 वर्ष के दिव्य ने फंदा लगा लिया।
केस - 4
4 सितम्बर को बूंदी शहर शहर के महावीर कॉलोनी में 24 वर्षीय नजमुद्दीन फंदे पर झूल गया। वह मानसिक अवसाद में था।

- देश में होने वाली आत्महत्याओं में राजस्थान का भाग 3.6 प्रतिशत।
- 15 से 44 वर्ष आयु वर्ग के लोग अधिक आत्महत्या कर रहे।
- महिलाओं की अपेक्षा पुरुष अधिक आत्महत्या कर रहे।

मानसिक अवसाद, टूटते परिवार जैसी वजहें
वरिष्ठ शिक्षाविद् वीरेन्द्र सिंह की माने तो पारिवारिक समस्याएं, नौकरी और पढ़ाई या किसी सामाजिक वजह से पैदा होने वाला मानसिक अवसाद, टूटते परिवार जैसी वजहें आत्महत्या के मामलों में आग का काम कर रही हैं। पहले संयुक्त परिवारों में मानसिक अवसाद की स्थिति में बीमार को परिवार और समाज का समर्थन मिलता था। नतीजतन वह इससे जल्दी उभर जाता था, लेकिन अब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। इस वजह से मानसिक अवसाद या पारिवारिक समस्या होने की स्थिति में लोग किसी के पास समाधान या समर्थन के लिए नहीं जा पाते। कुछ समय तक मन ही मन घुटने के बाद ऐसे ज्यादातर लोग संघर्ष से घबराकर मुक्ति के सहज तरीके के तौर पर आत्महत्या को चुन लेते हैं।

‘चि_ी ना कोई संदेश, जाने वो कौनसा देश, जहां तुम चले गए...’
- बेटे की मौत का दर्द बयां करते पिता की भर आई आंखें
‘चि_ी ना कोई संदेश, जाने वो कौनसा देश, जहां तुम चले गए...’। आज भी बेटे की याद में यही गीत गुनगुनाया। 24 साल की उम्र के बड़े बेटे ने दो वर्ष पहले 14 अगस्त के दिन फंदे पर झूलकर आत्महत्या कर ली। सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त बुजुर्ग बाप के कंधे पर आज भी इस बात का बोझ दिखा। पत्रिका से बातचीत करते आंखें भर आई। 62 वर्षीय बुजुर्ग पिता ने बताया कि बेटा चला गया जिसका जीवन भर गम रहेगा, लेकिन ऐसे मामले लगातार सामने आ रहे जो थमने चाहिए। जवान बेटे की असमय यों मौत जीवन भर भुलाई नहीं जा सकती। घर में सबकुछ ठीक-ठाक था। किसी चीज की जरूरत नहीं थी। बेटे के यों आत्महत्या कर लेने का कारण आज तक पता नहीं चला। अब सिर्फ उसकी यादें शेष रह गई। बुजुर्ग ने बताया कि बेटा हो या बेटी समय-समय पर खुद मां-बाप को उनकी काउंसलिंग करते रहें। उनके दु:ख बिना डांट डपट बांटने के साथ-साथ हिम्मत बढ़ाते रहें।

एक्सपर्ट व्यू
आत्महत्या को चिकित्सा क्षेत्र में एक बीमारी माना गया है। लोगों में भ्रांतियां है कि यह क्षणिक होता है, लेकिन वास्तविकता में यह लबे समय से चलता रहता है। व्यक्ति के रहन-सहन में परिवर्तन आने लगता है। इस समय वह परिस्थितियों से उभरने की कोशिश भी करता है, लेकिन जब वह सफल नहीं हो पाता तो आत्महत्या के अलावा कोई और उपाय नहीं दिखाई देता। यह बायोलॉजिकल होता है। व्यक्ति के दिमाग में कई तरह के रसायन स्त्रावित होने लगते हैं, जिससे यह स्थिति बनती है। युवाओं में यह अधिक देखा गया है। इसके तीन कारण माने जा सकते हैं। पहला ब्रेन में होने वाले रसायनिक परिवर्तन, दूसरा मानसिक बीमारी और तीसरा किसी के दिमाग में इस तरह के विचारों को कूट-कूट के भर दिया जाए, जिससे वह मरने और मारने को तैयार रहे। मानसिक स्वास्थ्य का पैमाना आत्महत्या की दर को माना गया है। अधिक आत्महत्या दर बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। वर्तमान में युवा अधिक महत्वाकांशी हो गया है और जब महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होती तो वह इस तरह के कदम उठाता है। जैसा कि पहले कहा है कि आत्महत्या से पहले व्यक्ति में परिवर्तन आने लगते हैं। आत्महत्या को रोकने के प्रयास भी उसी समय शुरू होने चाहिए। इसके लिए आसपास के लोगों और परिजनों को इसपर गौर करने की जरूरत होती है। यदि व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आया है तो उसे सामान्य न मानकर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। जिससे समय से इस तरह की घटना को रोका जा सके। पहले इनपर कोई ध्यान नहीं था, लेकिन अब इस और सभी का ध्यान गया है। इसके लिए अब जगह-जगह हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका परिवार के सदस्य ही निभा सकते हैंं।
- डॉ. बी.एस. शेखावत, मनोरोग विशेषज्ञ, कोटा

Nagesh Sharma Bureau Incharge
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