लंदन की लाइब्रेरी में शोभा बढ़ा रही बुरहानपुर की तस्वीर

- संवाद और विकास के लिए सांस्कृतिक विविधता के लिए विश्व दिवस पर विशेष
- विभिन्न सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण है बुरहानपुर

By: ranjeet pardeshi

Updated: 22 May 2020, 11:12 AM IST

बुरहानपुर. ताप्ती के किनारे बसा बुरहानपुर अनेकता में एकता कि विश्व में एक मिसाल है। यहां पर विभिन्न सांस्कृतिक विविधताएं भरी पड़ी है। जिसे दुनियाभर में लोग जानते, पहचानते थे। यहां की संस्कृति और धरोहरों को १८८५ में लंदन प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग भी पब्लिश कर चुका है। यहां की कई तस्वीर लंदन की लाइब्रेरी में भी शोभा बढ़ा रही है। एक तस्वीर ताप्ती किनार पर बहता पानी और किले की चित्रकारी की है। २१ मई को आए संवाद और विकास के लिए सांस्कृतिक विविधता विश्व दिवस पर बुरहानपुर की विशेष रिपोर्ट।
इतिहासविद् होशंग हलवलदार बताते हैं कि प्राचीन शहर बुरहानपुर को ऐसे ही विभिन्न संस्कृति का समावेश नहीं माना जाता। कई पुराणों में इसका उल्लेख हैं, तो कई किताबों में यहां का इतिहास उल्लेखित है। महाभारत काल के अश्वत्थामा ताप्ती नदी में स्नान कर सतियारा रोड पर बने गुप्तेश्वर के दर्शन कर जो मंदिर महाभारत काल से पहले का प्राचीनतम मंदिर है। यहां बिल मार्ग से आसा दुर्ग आसीरगढ़ में जाकर आसिरेश्वर की पूजा अर्चना करते हैं। यह संपूर्ण विवरण Óतापी महापुराणÓ में मिलता है। इसलिए यह शहर बहुत प्राचीन है।
इस प्राचीनतम नगर में सन 1396 में फारूखी बादशाहत की शुरुआत हुई। फारुखीयों ने 200 वर्षों तक शासन किया है इस दरमियान मुस्लिमों में और हिंदुओं में जो भाईचारा, जो एकता, जो अपनापनए, जिस प्रकार कपड़ा बुनने के लिए ताना और बाना चाहिए वैसे ही यह शहर सामाजिक एक रूपता का विश्व में अनोखा उदाहरण हैं। उस समय फारूखी दौर में बादशाह मुबारक शाह के बेटे एदलशाह फारूखी के द्वारा बुरहानपुर के मध्य में बनवाई गई जामा मस्जिद जो विश्व की एकमात्र मस्जिद हैÓ जिसमें संस्कृत अरबी और फारसी में शिलालेख है।
यह भी है विशेषता
यहां पर बोहरा समाज की सबसे बड़ी दरगाह दरगाह.ए.हकीमी जहां मौला अब्दुल कादिर हकीमुद्दीन साहब आराम फरमा रहे है। बोहरा समाज में पूरे विश्व में 52 रोजा.ए. मुबारक है जो सभी दाइयों सैयदनाओं के है, परंतु बुरहानपुर की दरगाह ए हकीमी जो 53वीं है, वे मौलाई है। विश्व के हर कोने से बोहरा समाज का व्यक्ति मौला की जियारत करने आता.आता ही है।
गुरुगोविंदसिंह भी आए थे बुरहानपुर
सन 1706 और 1707 में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंहजी का पदार्पण बुरहानपुर में हुआ वह 6 महीने और 9 दिन के लिए बुरहानपुर में रुके थे। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहब की रचना की। जिस पर सोने की स्याही से सोनी बीड़ से हस्ताक्षर किए यह विश्व का एकमात्र ग्रंथ साहब है। यहां पर गुरु गोविंद सिंह जी की गादी भी है, इसीलिए इस गुरुद्वारे को गुरुद्वारा बड़ी संगत पादशाही 10 के नाम से जाना जाता है।

यह भी है खास
यहां पर जैन मुनियों के सबसे बड़े संत स्वामी हेमचंद्र आचार्य श्री श्री 1008 उन्होंने यहां 6 साधु और साध्वीओं के साथ समाधि ली है। समाधि स्थल सोन बर्डी के जैन मंदिर भी है।
कबीर पंथ की भारत की गादी बुरहानपुर में है कबीर पंथ के बीजक और कबीर पंथ में दीक्षा लेने के लिए सारे भारत वर्ष से साधक बुरहानपुर में आकर दीक्षा लेते है।
भारत का स्वामीनारायण संप्रदाय का सबसे पहला मंदिर जिसमें श्री नारायण की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा स्वयं श्री हरि के हाथों हुई है, वह मंदिर बुरहानपुर में स्थापित है।
515 वर्ष पुराना श्री कृष्ण भगवान का लाडलेश लडडू गोपाल स्वरूप का मंदिर जिसमें प्रभु की ठोस सोने की मूर्ति विराजमान है, यह पुष्टिमार्गीय संप्रदाय का एक बहुत ही बड़ा तीर्थ स्थल है।
हमारे यहां बालाजी भगवान का बहुत ही प्राचीन मंदिर है।
ईद पर दोनों संप्रदाय के लोग गले मिलकर एक दूसरे को बधाई देते हैं। तो वहीं गणगौर के त्यौहार में स्त्रियां माता के जयकारे लगाती हैं। यहीं चर्तुमास में जैन मुनी श्रेष्ठ अपने आर्शिवचनों से समाज को सराबोर कर देते हैं। यही अनेकता में एकता की मिसाल है। २००२ से शुरू हुआ यह दिवस।

ranjeet pardeshi Bureau Incharge
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