इसे किले को  जीतने के लिए अकबर भी छह महीने तक खड़ा रहा था नीचे, पहली बार देखें ड्रोन का वीडियो

असीरगढ़ का किला मध्यप्रदेश के जिला बुरहानपुर में है। यह किला देखने में जितना सुंदर है उसकी कहानियां भी उतनी ही रोचक हैं। इस किले पर विजय पाने के लिए जब अकबर पहुंचा तो उसे भी छह महीने तक नीचे खड़ा रहना पड़ा था और अंत में उसे भी हार माननी पड़ी थी...



बुरहानपुर.  बुरहानपुर जिला मुख्यालय से इंîदौर इच्छापुर हाईवे पर 20 किलोमीटर दूर सतपुडा पर्वत शृंखला पर 750 मीटर ऊंचाई पर बसे इस किले में अपने आप में सैकड़ों कहानी दफन हैं। इस किले की मुख्य बात यह है कि जिसने भी अपनी ताकत से इस किले को जीतना चाहा उसे मुंह की खानी पड़ी।
इस कारण हजारों साल पहले बने इस किले को पूरे देश पर राज करने वाले शासक भी जीत नहीं पाए। जितने भी शासक रहे हैं इनमें से सब ने झल कपट से इस पर विजय पाई। आजादी के पहले तक इस पर अंग्रेजों का कब्जा रहा है और उसके पहले सबसे ज्यादा शासन काल मुगलों का रहा।

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Full Story Asirgarh Fort of Burhanpur

यह किला तीन भागों में विभाजित है ऊपरी हिस्सा असीरगढ़, बीच का कमरगढ़ और निचला मलयगढ़ कहलाता है। इस किले का निर्माण कब हुआ यह इतिहासकार भी नहीं बता पाए लेकिन पुरातत्व विभाग और पुराने एतिहासिक पत्थरों व इस किले में मौजूद चीजों को देखकर कई कहानियां लोगों ने गढ़ दी हैं।
 कुछ कहते हैं कि यह किला अश्वत्थामा की पूज्य स्थली है और कुछ इसे एक सूफी संत का स्थान बताते हैं। वहीं कुछ  इसे 'आशा अहिर Ó नाम के एक व्यक्ति ने की थी और इसलिए इस किले का नाम असीरगढ़ रख दिया गया।



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हवा से दिखते हैं पांच तालाब, एक मंदिर एक मस्जिद
ड्रोन से लिए जिस वीडियो को आप देख रहे हैं उसमें 60 एकड़ में फैला यह किला दिख रहा है। इसमें पांच तालाब हैं और गंगा व जमुना नाम के दो कुंड भी दिखाई दे रहे हैं। इतनी ऊंचाई पर होने के बावजूद भी सालभर ये कुंड कैसे लबालब रहते हैं, यह बात आज तक कोई नहीं जान पाया। एक मंदिर और एक मस्जिद की ऊंची मीनार भी ड्रोन कैमरे के पास आने पर दिखाई देती है। कहा यह भी जाता है कि दुश्मन को मारकर इन कुंडों में डाल दिया जाता था।
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दो रास्तों से जा सकते हैं इस किले पर
इस किले तक पहुंचना है तो आप को दो रास्ते हैं। एक रास्ता पूर्व की तरफ से होकर जाता है दूसरा उत्तर दिशा में है। पूर्व दिशा से होकर जाने वाला रास्ता सबसे सरल है। और दूसरा रास्ता बहुत ही ज्यादा खराब है, लेकिन इस रास्ते से जाने के लिए वाहन का उपयोग किया जा सकता है, इसके अलावा पूर्व के रास्ते से जाना है तो आप सीढिय़ों से चढ़कर जा सकते हैं, यहां 1000 सीढिय़ां हैं।

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छल-कपट कर ही कर पाए थे शासन
इतिहासकारों का कहना है कि इसे 'आशा अहीरÓ नाम के व्यक्ति ने बनवाया था। इसके पास अनगिनत पशु थे। इनकी जिन्हे शेर व अन्य जानवर खा रहे थे और कई राजाओं ने भी इससे इनके पशु जब्त कर लिए थे। इसके बाद भी इन पशुओं को गिनना मुश्किल था। लेकिन अंदाज लगाते हुए आशा असीर समझ जाता था कि पशु कम हो गए हैं।
 इसकी सुरक्षा के लिए उसे ऐसे स्थान की जरूरत थी जहां से वह नजर रख सके और उनकी सुरक्षा हो सके। उनसे एक ऐसा स्थान चुना जहां पर पूरी सुरक्षा हो सकती थी, लेकिन वहां एक तेजस्वी सूफी संत रहा करते थे, जिनका नाम था हजरत नोमानन चिश्ती। उस समय लगभग आठवी शताब्दी रही होगी।


 यहां पहुंचकर सूफी संत ने आशा अहीर ने मिन्नत की और अपने परिवार व पशुओं की सुरक्षा करने का निवदेन किया। संत मान गए और उसे यहां रहने की अनुमति दे दी। इसके बाद आशा अहीर पर छल से फिरोजशाह तुगलक के एक सिपाही मलिक ख़ां के पुत्र नसीर ख़ां फारूकी ने असीरगढ़ पर कब्जा किया। वहीं आदिलशाह फारूकी के मरने के बाद असीरगढ़ पर बहादुरशाह  फारूखी ने कब्जा कर लिया।

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अकबर भी बेताब हो गए थे किले पर कब्जा करने के लिए
जब इस किले के बारे में धीरे-धीरे लोकप्रियता बढ़ी तो मोहम्मद अकबर जिनका पूरे देश पर कब्जा था वे भी इस पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए व्याकुल हो उठे थे। उस समय बहादुरशाह फारूखी का कब्जा था।  जब उसे पता चला कि अकबर इस किले पर कब्जा करना चाहते हैं और सेना भेज रह ेहैं तो उसने इस किले की व्यवस्था इतनी दुरुस्त और शक्तिशाली तरीके से की कि किले में 10 साल तक खाने की वस्तुएं उपलब्ध हो सकतीं थीं।
 ऐसे में अकबर को छह महीने तक इस किले के नीचे खड़ा रहना पड़ा था। सम्राट कहे जाने वाले अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण तो किया लेकिन किले के सारे रास्ते बंद होने के कारण वे किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सके और हार मान गए। इसके बाद  अकबर ने एक रणनीति तैयार की और बहादुरशाह को संदेश भेजकर यह विश्वास दिलाया कि वे आपस में बात करना चाहते हैं किसी पर कोई प्राणघातक हमला नहीं किया जाएगा। बात करने के लिए बहादुरशाह किले से बाहर आया।
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जब बातचीत चल रही थी तभी पीछे से आकर हमला कर दिया और जख्मी हालत में गिरफ्तार कर बंदी बना लिया और 17 जनवरी 1601 ई. को असीरगढ़ के किले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई व किले पर मुगल शासक का झंडा फहरा दिया गया। उसके बाद भी शासक आए लेकिन अंत में 1904 ई. में इस पर अंग्रेज़ी सेना ने निवास किया।

मीडिया ने भी बताई थी अश्वत्थामा की कहानी
मीडिया ने यहां अश्वत्थामा होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं। यहां पर कवरेज कर बताया था कि महाभारत काल के अश्वत्थामा अपने पिता गुरु द्रोण की हत्या का बदला लेने के लिए अब भी भटक रहे हैं। कई बार अश्वत्थामा गांव वालों को भी दिखाई दिए हैं।
 महाभारत काल लगभग 5000 वर्ष पहले का माना जाता है, इतने वर्षों बाद भी अश्वत्थामा का जिंदा रहना महाभारत की कहानी बयां करता है, जिसमें कृष्ण ने उन्हे अमरता का वरदान दिया था। गांव वालों का कहना है कि अश्वत्थामा किले में बने शिव मंदिर में रोज शिव की आराधना करने आता है।
 कई ग्रामीणों ने इसे देखा है और खेत व सतपुड़ा के जंगल में भी इनके बड़े-बड़े पांव देखे हैं। यहां तक की एक पुलिसकर्मी को भी अश्वत्थामा ने घायल किया है।

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नीचे बने मंदिर में मुसलिम करता है शिव मंदिर में पूजा
असीरगढ़ किले के नीचे बने शिव मंदिर में मोहम्मद जहीर अल्लाह की पूजा तो करता ही है साथ में पास में बने शिव मंदिर में भी साफ-सफाई और पूजा की जिम्मेदारी इसी की है। इन्हे हिंन्दू और मुसलमान धर्म में कोई अंतर नजर नहीं आता। इनका यह मानना है कि जिस धर्म में इन्होंने जन्म लिया है उसे वे पूरी शि²त के साथ मानते हैं और जब बात आती है कि सब का मालिक एक  तो शिव की पूजा और साफ-सफाई करने में इन्हे होकी परहेज नहीं होता।
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Editorial Khandwa
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