नौकरियां जा रही हैं, फिर भी 70 फीसदी लोगों ने चुकाई अपनी किस्त

  • आरबीआई ने छह महीने के लिए जारी की मोनोटोरियम पॉलिसी, लेकिन यूजर इसके साथ नहीं
  • एयू बैंक के एमडी ने कहा, प्रयास बेहतर हुए बैंकों के पास पर्याप्त लिक्विडिटी

     

By: shailendra tiwari

Updated: 01 Jun 2020, 06:01 PM IST

नई दिल्ली.
एक ओर देश में 25 करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गई हैं और लोगों के सामने वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। वहीं दूसरी ओर मोनोटोरियम को लेकर आया आंकड़ा चौंकाने वाला है। देश में औसत 30 से 40 फीसदी ही लोगों ने अपनी किस्तों को आगे बढ़ाने का फैसला किया है और मोनोटोरियम का फायदा लिया है। हालांकि ज्यादातर लोगों ने अपनी किस्त चुकाने में भलाई समझी है।

दरअसल, आरबीआई ने मोनोटोरियम को देश के लिए सबसे फायदेमंद कदम बताया था। जिसमें बैंक की किस्तों को तीन—तीन महीने की दो बार आगे बढ़ाने का ऐलान कर दिया। हालांकि इस दौरान ब्याज में छूट नहीं मिलने के कारण इसका फायदा उठाने से लोगों ने परहेज किया। वित्तीय जानकारों का कहना है कि मोनोटोरियम में जिस किस्त में छूट ली जाएगी, उसका ब्याज मूलधन के साथ जुड़ जाएगा, ऐसे में लोन लेने वाले को आने वाले वक्त में ज्यादा रकम चुकानी होगी। वहीं, एयू बैंक के एमडी संजय अग्रवाल का कहना है कि इस वक्त बैंकों के पास पर्याप्त लिक्विडिटी है। बैंकों को पैसे की परेशानी नहीं है। हालांकि मोनोटोरियम का ज्यादा फायदा लोगों ने नहीं उठाया है। उनकी बैंक में औसतन 73 फीसदी ग्राहकों ने अपनी किस्त मई—जून तक चुकाई है। वहीं, देश के आंकड़ों पर उन्होंने कहा कि देश में 30 से 40 फीसदी लोगों ने ही इसका फायदा उठाया है।

देश को कितना नुकसान, अगली तिमाही में मालूम होगा
लॉकडाउन से देश को और कारोबार को कितना नुकसान हुआ है, इसका आंकलन अभी जल्दबाजी होगा। अगर संजय अग्रवाल की मानें तो इसका सही आंकलन आने वाली तिमाही में ही होगा। यह तिमाही पूरी तरह से लॉकडाउन में ही गुजर जाएगी। ऐसे में आने वाली तिमाही ही बताएगी कि किस सेक्टर में कितना नुकसान हुआ है। बैंकों को भी तकलीफ आ सकती है, लेकिन इसका अंदाजा अभी से नहीं लगाया जा सकता है कि किस तरह का नुकसान आएगा। बैंकों के लिए केवल लोन रिकवरी ही मुद्दा नहीं है, दूसरे मामले भी हैं।

कैसे खड़ा होगा देश, अंदाजे में बता रहे सभी
एमडी संजय अग्रवाल ने कहा कि आरबीआई ने अच्छा काम किया है। काफी राहत भी दी है। उसकी फिस्कल नीति और मोनोटोरियम पॉलिसी भी अच्छी आई है। लेकिन असल परेशानी यही है कि सरकार को ही रीयल डैमेज का अंदाजा नहीं है। जब बीमारी ही नहीं मालूम है तो फिर इलाज क्या होगा। हालांकि इसके लिए हमें इंतजार करना चाहिए। 20 लाख करोड़ का पैकेज आखिरी नहीं कहा जा सकता है। सरकार सितंबर में फिर आएगी और फिर सही अंदाजे के हिसाब से जरूरतमंद इंडस्ट्री के साथ वापस खड़ी होगी। ऐसी उम्मीद की जा सकती है। उन्होंने कहा कि कोई भी नहीं जानता है कि इस दौर में ऐसे क्या रीयल फैक्ट होंगे, जिससे इकॉनोमी को उठाया जा सके। किसी ने यह दौर नहीं देखा है। अभी जितने भी लोग बोल रहे हैं, वह केवल अपने परसेप्शन पर बोल रहे हैं। असल अंदाजा भी किसी को नहीं है कि आखिर हालात क्या हैं।

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