यहां के आदिवासी कोरोना से बचने के लिए कर रहे हैं यह काम

सिर पर जब मौत मंडराने लग ( When death is on head ) जाए तो सबसे पहले उससे बचाव के उपाय किए जाते हैं। चाईबासा जिले के आदिवासी भी कोरोना के प्रभावों ( Corona effect ) को लेकर जागृत हो गए हैं। इनका मानना है कि कच्चे घरों में ( Tribal making bricks ) कोरोना का प्रवेश हो सकता है। इसलिए खुद ही मेहनत करके पक्के घर बना रहे हैं।

By: Yogendra Yogi

Published: 27 Mar 2020, 07:02 PM IST

चाईबासा: सिर पर जब मौत मंडराने लग ( When death is on head ) जाए तो सबसे पहले उससे बचाव के उपाय किए जाते हैं। चाईबासा जिले में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। इस जिले के आदिवासी भी कोरोना के प्रभावों ( Corona effect ) को लेकर जागृत हो गए हैं। सरकार और बगैर किसी की मदद के आदिवासियों ने अपने बलबूते ही ईंटों के घर बनाने शुरु किए हैं। इनका मानना है कि कच्चे घरों में ( Tribal making bricks ) कोरोना का प्रवेश हो सकता है। इसलिए खुद ही मेहनत करके पक्के घर बना रहे हैं।

ईट-भट्टे हो चुके बंद
चाईबासा ओर उसके आस-पास के क्षेत्रों में फ्लाई ऐश से ईंट बनाने के कई प्लांट हैं। कोरोना के कारण विगत २२ मार्च से लागू हुए लॉक डाउन के कारण सभी प्लांट बंद हो चुके हैं। इसी तरह पश्चिमी सिंहभूमि जिले के ज्यादातर ईट भट्टे बंद हो चुके हैं। इससे ईंटों की आपूर्ति का काम रुक गया है। भट्टों में मजदूरी करने वाले श्रमिक अपने घरों का लौट चुके हैं। अब समस्या पक्के घर बनाने में आ रही है।

मिट्टी से बना रहे ईंटें
ईंटों की आपूर्ति नहीं होने से पक्के घरों का निर्माण भी बंद हो गया है। ईंट भट्टे बंद होने से आदिवासियों ने खुद ही ईंटों का निर्माण शुरु कर दिया। उनका मानना है कि कोरोना से बचाव के पक्के घर होना जरूरी है। इनका कहना है कि जब घर नहीं होगा तो बचाव कैसे होगा। कुछ आदिवासी परिवार खेतों की मिट्टी से ईंट निर्माण करने में लगे हुए हैं। खेतों की मिट्टी को युवा गूंदते हैं। महिलाओं ईंटों के लिए पानी लाने का इंतजाम करती हैं। वैसे भी ईंट भट्टों पर मजदूरी करने वाले आदिवासी परिवार अब फुर्सत में हैं। इस फुर्सत का फायदा अपने घरों को पक्का बनाने के लिए कर रह हैं।

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