पंजाब को झटका, जल समझौता रद्द करने का कानून निरस्त

यह कानून 15 जनवरी 2002 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद 4 जून 2004 के फैसले और आदेश को नाकाम करने के लिए बनाया गया था

नई दिल्ली। पंजाब को गुरुवार को एक बहुत बड़ा झटका लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने सतलज-यमुना के पानी को हरियाणा के साथ बांटने से इनकार करने के इरादे से वर्ष 2004 के बनाए गए पंजाब के कानून को असंवैधानिक करार दिया है। पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट-2004 को संविधान के प्रावधानों के तहत स्वीकार्य नहीं ठहराते हुए न्यायमूर्ति अनिल आर दवे, शिवकीर्ति सिंह, पिनाकी चंद्र घोष, आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति अमिताव राय की संविधान पीठ ने प्रेसिडेंसियल रेफरेंस के तहत आए सभी चार प्रश्नों का नकारात्मक जवाब दिया।

न्यायमूर्ति दवे ने न्यायाधीशों के बहुमत की राय की घोषणा की, वहीं न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह ने इस राय से सहमति जताते हुए अलग से अपनी टिप्पणी की। अमरिंदर सिंह के नेतृत्ववाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार की पहल पर पंजाब विधानसभा ने एकमत से एक कानून पारित किया था जिसमें हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, चंडीगढ़ और दिल्ली के साथ सतलज-यमुना नदी जल साझीदारी के सभी करार रद्द किए गए थे।

यह कानून 15 जनवरी 2002 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद 4 जून 2004 के फैसले और आदेश को नाकाम करने के लिए बनाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 17 मार्च 2016 के उस अंतरिम आदेश की अवधि बढ़ाने से भी इनकार कर दिया जिसके तहत उसने केंद्रीय गृह सचिव के नेतृत्व में यह सुनिश्चित करने के लिए रिसीवर नियुक्त किया था कि सतलज-यमुना लिंक नहर के लिए किसानों से अधिगृहीत भूमि से छेड़छाड़ नहीं किया जाए।

पंजाब विधानसभा ने नहर निर्माण के लिए अधिगृहीत भूमि किसानों को लौटाने का भी एक कानून बनाया था। इस फैसले के बाद कांग्रेस की पंजाब इकाई के मौजूदा अध्यक्ष अमरिंदर सिंह ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इस फैसले को राज्य के साथ अन्याय बताया और कहा कि पंजाब की बादल सरकार राज्य के हितों की नाकाम रही है।
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जमील खान Desk
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