अनहोनी पर लाल रंग का हो जाता है शिवलिंग

अनहोनी पर लाल रंग का हो जाता है शिवलिंग
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Mukesh Kumar Sharma | Publish: Feb, 02 2016 11:43:00 PM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

तिरुवल्लूर जिले के पेरुम्बाक्कम के निकट कूवम में भगवान शंकर का श्री त्रिपुरांतकेश्वर मंदिर है। मंदिर का वर्णन

चेन्नई।तिरुवल्लूर जिले के पेरुम्बाक्कम के निकट कूवम में भगवान शंकर का श्री त्रिपुरांतकेश्वर मंदिर है। मंदिर का वर्णन पाडल पेट्र स्थलम में मिलता है जिसमें 274 शिवालयों का उल्लेख है। मान्यता है कि बरसात के मौसम में शिवलिंग स्फटिक की तरह चमकता है और कुछ अनहोनी घटने पर लाल रंग का हो जाता है। इस शिवालय को अग्नि स्थल के रूप में वर्गीकृत किया गया है। शैव संत तिरुज्ञानसंबंदर ने भक्ति काव्य में कहा है कि यह वह भगवान है जिन्होंने हमें वेद दिया, संपादन किया और आचार संहिताओं जिनको हम अंगम और आगम कहते हैं उपलब्ध कराए। भगवान ने ही शक्तिशाली राक्षस त्रिपुर का संहार किया और तिरुवीरकोलम कहलाए। यह मंदिर थेवारम में वर्णित तोंडैमान क्षेत्र का चौदहवां शिव स्थल है।

मंदिर का इतिहास और संरचना

यह मंदिर भी करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है। मंदिर का कोई विशाल गुम्बद नहीं है। संरचना सामान्य सी है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग त्रिपुरांतक स्वामी का है। उनकी उत्सव मूर्ति का नाम सोमस्कंधर है। देवी पार्वती की अलग सन्निधि हैं जो त्रिपुरांतक नायकी नाम से विराजित हैं। मंदिर में अतिप्राचीन बिल्व वृक्ष और अग्नि तीर्थकुण्ड है। त्रिपुर असुर के वध की वजह से इस क्षेत्र का पौराणिक नाम तिरुवीरकोलम पड़ा। गर्भगृह के ऊपर निर्मित गुम्बद का नाम गजबृहद विमान है। शैव संत तिरुज्ञानसंबंदर ने इस मंदिर से जुड़ी दस काव्य रचनाओं में असुर के वध का ही वर्णन है। गर्भगृह के द्वारपाल भी तारकासुर और विद्युन्मली है। गुम्बद के सामने एक मण्डप है जहां माना जाता है कि भगवान नटराज ने कदल तांडव किया किया था। मंदिर परिसर में श्रीचक्र भी स्थापित है। भगवान मुरुगन की छह सिरों वाली मूर्ति भी मंदिर में है जो वल्ली और देवयानै के साथ दर्शन देते हैं। भगवान भैरव की भी मूर्ति है जो अपने वाहन श्वान के साथ हैं।

अग्नि तीर्थ में नहीं हैं मेंढक

भगवान शिव के सिर पर चोट व निशान होने की मान्यता की वजह से यहां पूजा और आराधना के वक्त शिवलिंग के शीर्ष को नहीं छुआ जाता। भगवान शंकर के शीर्ष कर्पूर का चूर्ण छिड़का जाता है और अभिषेक होता है। मान्यता यह भी है कि भगवान शिव आज भी यहां तपस्यारत है। अग्नि तीर्थ में इसी वजह से मेेंढक नहीं है क्योंकि उनकी टर्र-टर्र से भगवान शिव की तपस्या भंग हो सकती है। त्रिपुर असुर के संहार की वजह से भगवान शिव को त्रिपुरांतक कहा गया। मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि भोलेनाथ ने धनुष-बाण धारण कर रखे हैं ऐसे दर्शन अत्यंत कम देखने में मिलते हैं। चैत्र महीने के ब्रह्मोत्सव में भगवान शंकर के धनुष बाण रूप के दर्शन होते हैं।

पौराणिक कथा

मुनि मुंजीकेशर और कार्कोडर के निवेदन पर भगवान शिव ने यहां ऊध्र्व तांडव किया। भगवान नटराज ने अपनी तेजस्वी मुद्राओं से देवी काली को प्रतियोगिता में परास्त किया। देवी को यह हार स्वीकार्य नहीं थी। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान ने कहा कि वे तिरुवीरकोलम में रक्षा तांडव करेंगे और वे इसके दर्शन कर अपना क्रोध शांत कर सकेंगी। देवी काली के भी इस मंदिर में दर्शन होते हैं।


 उनका नामकरण तारका माता के रूप में हुआ है। तारका का संस्कृत में स्पद्र्धा से है। प्राचीन किंवदन्ती के अनुसार तीन असुरों तारका, कमलाक्षण और विद्युन्मली को प्रजापिता ब्रह्मा से वरदान मिला। वे शक्तिशाली हो गए और देवताओं को सताने लगे। देवताओं ने शिव की शरण ली। शिव ने तीर और तरकश उठाया व युद्ध के लिए निकले। लेकिन किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले गणेश वंदना करना भूल गए। उनके साथ ही देवताओं ने भी यही गलती की। नाराज भगवान गणेश ने शिव के रथ के पहिए की धुरी तोड़ दी। शिव के आग्रह पर विनायक ने फिर रथ का पहिया जोड़ा।  जहां धुरी (तमिल में कूर) टूटी थी वहां शिव स्वयंभू रूप में प्रकट हुए। इस वजह से स्थल का नाम कूरम पड़ा और अपभ्रंश होते हुए कूवम पड़ गया।

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