किताबें कुछ कहना चाहती है, तुम्हारे पास रहना चाहती है...

विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष
किताबें कुछ कहना चाहती है, तुम्हारे पास रहना चाहती है

By: Ashok Rajpurohit

Published: 22 Apr 2021, 10:59 PM IST

चेन्नई. किताबें करती हैं बातें बीते जमानो की, दुनिया की, इंसानों की, आज की कल की, एक-एक पल की, खुशियों की गमों की, फूलों की बमों की, जीत की हार की, प्यार की मार की, सुनोगे नहीं क्या किताबों की बातें। किताबें, कुछ तो कहना चाहती है, तुम्हारे पास रहना चाहती है। सफदर हाशमी की यह कविता किताबों को जुबां देने जैसी है।
मौजूदा दौर में देखा जाएं तो पाठक का किताबों से लगाव थोड़ा कम नजर आने लगा है। आजकल डिजीटल के कारण लोग आनलाइन पढ़ाई पर ही अपना अधिक फोकस करने लगे है। इन दिनों कोरोना के चलते ही आनलाइन एजुकेशन की डिमांड में यकायक बढ़ोतरी हुई है। डिजिटल इंडिया के प्रसार के साथ लॉग इन करके किताबें ऑनलाइन पढ़ने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है। इसलिए बाजार में इसके लिए गेजेट भी उपलब्ध होने लगे हैं। छोटे शहरों में भी पाठक और साहित्यप्रेमी किताबें आनलाइन खरीदने लगे हैं। हर साल 23 अप्रेल को विश्व पुस्तक दिवस मनाया ही इसीलिए जाता है कि दुनिया अपनी तरक्की में पुस्तकों के महान योगदान को भूलने न पाए और समझे कि पुस्तकें महज कागज का पुलिंदा नहीं बल्‍कि वे भूत और भविष्‍यकाल को वर्तमान में जोड़ने का काम करती हैं। यूनेस्को द्वारा विश्व पुस्तक तथा स्वामित्व दिवस का औपचारिक शुभारंभ 23 अप्रेल 1995 को किया गया था। विश्व पुस्तक दिवस के मौके पर राजस्थान पत्रिका ने सुधी पाठकों के विचार जानें।
.....................


पढ़ने की तरफ रूझान कम हुआ
ऐसा प्रतीत होता है जैसे सूचना और जानकारी ही आज ज्ञान बनकर रह गया है...आज लोग मोबाईल से ही ऐसा ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं बाकी पठन पाठन में पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि पहले से कम दिखाई देती हैं...ज्ञान अर्जन के लिए पढ़ने और पढ़ाने वाले लोगों के पास न ही पहले सा समय है ना ही धैर्य है ना ही साहित्य के प्रति वो रुचि है।।इंटरनेट से जो पुस्तकें उपलब्ध है उनको भी अधिकांशतः सारांश में संक्षेप में लिखने की कोशिश रहती है अतः कहानियां वो रुचि पैदा भी नहीं कर पाती..जिससे लोगों का आकर्षण या रुझान पढ़ने की तरफ पहले से कम हुआ है।।
- रेनू आर्या अग्रवाल, कवयित्री व लेखिका, चेन्नई।
..................


अभी डिजिटल का चलन बढ़ रहा
हां. आज जरुर डिजिटल के युग में लोगों की पठन के प्रति रुचि कम हुई है। ऐसे पाठक जो किताबें नहीं खरीद सकते, डिजिटल लाइब्रेरी से हासिल कर सकते हैं। लेकिन पढ़ना केवल पढ़ना नहीं है, छपी किताब से जो आत्मीय रिश्ता पाठक का बनता है, वह डिजिटल बुक से नहीं बन सकता।
- मयूरी शर्मा, छात्रा, कन्यका परमेश्वरी कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, चेन्नई।


नई पीढ़ी दूर हो रही
इस वर्तमान समय मे युवाओं को अखबार , पुस्तकें , ग्रंथ, उपन्यास आदि पढने का शोक कम होता जा रहा है। कारण कि उनके पास समय भी कम है ओर आजकल शोशियल साईट , नेट पर सब कुछ जब चाहो तब उपलब्ध हो जाता है। हा आज भी जो पचास व उससे अधिक उम्र के लोग है उनको पढने का थोडा शोक है।
- हस्तीमल रामावत, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अ.भा.वैष्णव महासभा।
...........


अपना रहे शार्टकट
आसमान छूती मंहगाई के चलते मशीन बन चुकी जिंदगी ने पठन-पाठन के प्रति लोगों की रूचि को कम कर दिया है। आज ज्ञान की जगह तात्कालिक समाधान पर अधिक जोर देते हए लोग सार्टकट अपनाने लगे हैं।
-सतीश श्रीवास्तव, वरिष्ठ कवि, चेन्नई।
.............

Ashok Rajpurohit
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned