महापुरुषों के सदगुण जीवन में उतारें

महापुरुषों के सदगुण जीवन में उतारें

Santosh Tiwari | Publish: Sep, 04 2018 11:51:33 AM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

राष्ट्रसंत तरुणसागर ने अपने तपोबल, चिंतनबल से लाखों लोगों को ज्ञान का अमृत प्रदान किया है। शांतिबाई के लाल होकर इन्होंने शांति के साथ नहीं बल्कि क्रांति के साथ प्रवचन दिया। पवन नामक बालक ने अंत समय तक तरुण बनकर अपनी तरुणाई के साथ पवन की तरह निरंतर गतिशील रहकर सद्गति की ओर महाप्रयाण किया है।

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले की कुछ घटनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कुछ महापुरुष ऐसे होते है जिनके नाम से तिथि चलती है उन्हीं महान लोगों में भगवान श्रीकृष्ण भी थे। इस जीवन में जो घटनाएं घटती हैं वे मनुष्य के स्वयं के नसीब से होती हैं। उसी प्रकार कृष्ण के जन्म के समय हुआ था। समय आने पर कृष्ण ने अत्यचारों का खात्मा कर उनका अवसान किया। उनके आदर्श जीवन में उतारना चाहिए। ऐसे महापुरुषों के जन्मदिन पर हमें उनके जीवन से सद्प्रेरणा लेनी चाहिए। धर्म शासन को पाकर जो परमात्मा की वाणी समझते है उनका जीवन सुधर जाता है।
सागरमुनि ने कहा आचरण व्यक्ति को ऊंचाई पर ले जाता है। पाप करने से आत्मा नरक की ओर बढ़ती है। यह केवल लोभ की वजह से होता है। लोभ कर मनुष्य स्वयं ही नरक का मार्ग बनाता है लेकिन अच्छे कर्म कर अच्छा भव पा सकता है। धर्मसभा में संघ के अध्यक्ष आनंदमल छल्लाणी व अन्य पदाधिकारी उपस्थित थेे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया।
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छोटी सी जिंदगी में बड़ा जीवन जी गए तरुणसागर
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित आचार्य संयमरत्न विजय कोंडीतोप में सुंदेशा मूथा भवन पहुंचे जहां विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर के शिष्य तरुणसागर को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर मुनि ने कहा आज तक हमें तरु पर पुष्प खिलते देखे है, लेकिन यहां पर तो स्वयं पुष्प (पुष्पदंत सागर) ने तरु (तरुणसागर) को प्रकट किया है। वे छोटी सी जिंदगी में बहुत बड़ा जीवन जीकर चले गए, कम समय में दम का कार्य कर गए। राष्ट्रसंत तरुणसागर ने अपने तपोबल, चिंतनबल से लाखों लोगों को ज्ञान का अमृत प्रदान किया है। शांतिबाई के लाल होकर इन्होंने शांति के साथ नहीं बल्कि क्रांति के साथ प्रवचन दिया। पवन नामक बालक ने अंत समय तक तरुण बनकर अपनी तरुणाई के साथ पवन की तरह निरंतर गतिशील रहकर सद्गति की ओर महाप्रयाण किया है। उनकी सहज-सरल भाषा जीवन की एक नयी परिभाषा बन गई। तरु की तरह अपने चिंतन रूपी फल-फूल व छाया जगत को दे गए। मुनि ने तप की महिमा बताते हुए कहा कि तपस्या द्वारा जन्म-जन्मान्तरों के एकत्रित पाप शीघ्र ही घटकर नष्ट हो जाते हैं।

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