हजारों छात्रों की डिग्री अमान्य करार

हजारों छात्रों की डिग्री अमान्य करार

Sanjay Kumar Sharma | Publish: Feb, 15 2018 09:57:51 PM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

पत्राचार से इंजीनियरिंग की डिग्री अमान्य करार देने के बाद लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है।

चेन्नई. पत्राचार से इंजीनियरिंग की डिग्री अमान्य करार देने के बाद लाखों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है। ऐसे छात्र अब प्रधानमंत्री से दखल की मांग कर रहे हैं। पिछले साल नवम्बर में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया था जिसमें 2001 के बाद की पत्राचार से की गई इंजीनियरिंग की डिग्री को अमान्य करार दिया गया। चार डीम्ड विश्वविद्यालयों की ओर से चलाए जा रहे इन पाठ्यक्रमों पर कोर्ट ने यह निर्णय दिया था। प्रभावित छात्र अब प्रधानमंत्री से दखल देने तथा पुनरीक्षण याचिका लगाने पर विचार कर रहे हैं। इस निर्णय के बाद उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा और हजारों छात्र बेरोजगार हो गए। दरअसल जिन विश्वविद्यालयों ने पत्राचार से पाठ्यक्रम शुरू किया था उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के साथ ही अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) से पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए अप्रूवल लेनी थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इन तीन विश्वविद्यालयों में तमिलनाडु की विनायक मिशन्स रिसर्च फाउण्डेशन, जेआरएन राजस्थान विद्यापीठ, इन्स्टीट्यूट आफ एडवांस स्टडीज इन एजूकेशन इन राजस्थान तथा इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट (एएआई) शामिल हैं।
हालांकि कोर्ट ने प्रभावित छात्रों को अवसर दिया है और उन्हें 2018 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की ओर से आयोजित परीक्षा पास करने को कहा है। ऐसे छात्र जिन्होंने 2001 से 2005 के बीच परीक्षा उत्तीर्ण की है वे इस साल फिर से नई परीक्षा में बैठ सकेंगे। हालांकि 2005 के बाद डिग्री लेने वालों के लिए कोर्ट ने कोई विकल्प नहीं दिया है।
इस फैसले से प्रभावित प्रसांत सेन ने कहा, मेरी उम्र 30 के पार है तथा एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता हूं। नवम्बर 2017 में आए निर्णय के बाद उसकी डिग्री अमान्य हो गई। उसे नहीं पता कि जहां से उसने डिग्री हासिल की उसके लिए मान्यता ली गई या नहीं। उसने 2004 में इलाहाबाद एग्रीकल्चर इन्स्टीट्यूट (एएआई) में प्रवेश लिया था। वह अपने परिवार का पहला इंजनियरिंग ग्रेजुएट था। वह कालेज छात्रावास में रहा तथा कालेज की ओर से भेजे हर औद्योगिक टूर में भी गया। डिग्री के दौरान साप्ताहिक प्रैक्टिकल में भी हिस्सा लिया तथा एक एमएनसी में इंटर्नशिप पूरी की।
सेन ने कहा, उसकी पत्नी गर्भवती है। मेरा परिवार मेरी आय पर ही निर्भर है। मैं नौकरी कैसे छोड़ सकता हूं। कंपनी को यह पता चला तो वह मुझे नौकरी से निकालने का निर्णय ले सकती है।
फैसले ने जिंदगी को बनाया नरक
चेन्नई के टी. वासुदेवन ने कहा, जेआरएन विद्यापीठ से पढ़ाई के दौरान 85 हजार रुपए खर्च हुए। अब इस फैसले से हमारी जिंदगी को नरक बना दिया है। उसने एयरोनोटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली है। उसने वर्ष 2001 में पूरी तहकीकात के बाद ही रेपुटेड एवं अपनी सुविधा के अनुसार ही कालेज का चयन किया था। नियमित रूप से कालेज जाने के दो साल बाद बताया गया कि यह पाठ्यक्रम डिस्टेंस एजुकेशन से कराया जा रहा है। वित्तीय अभाव के चलते उसने कालेज को नहीं बदला। कोर्ट के इस निर्णय उसे झटका लगा है कि डिस्टेंस एजुकेशन से की गई डिग्री मान्य नहीं होगी। वासुदेवन का कहना है कि कोर्ट ने इस साल परीक्षा फिर से देने का विकल्प खुला रखा है लेकिन 15 साल पहले जो पढाई पूरी की थी उसे अब कैसे याद रखा जा सकता है। एयरोनोटिकल का पाठ्यक्रम काफी कठिन हैं जिसे चार साल में पढऩा भी आसान नहीं होता है। जिसे अब कुछ महीनों में कैसे याद कर सकते हैं। मैं नौकरी कर रहा हूं और नौकरी करते पढ़ाई भी कर पाना संभव नहीं है। मेरे परिवार का गुजर-बसर मेरी नौकरी से ही हो रहा है। जेआरएन राजस्थान विद्यापीठ से डिग्री कर चुके के.वी. राहुल ने कहा, सीपीडब्ल्यूडी, एयर इंडिया सरीखे संस्थान इस निर्णय के बाद उन लोगों को नहीं रखेंगे। मेरे एक मित्र ने 10 नवम्बर 2017 को इंडिगो का साक्षात्कार पास कर लिया था। इस दौरान ही कोर्ट का निर्णय आया था और प्रमाण पत्रों के सत्यापन के बाद उसे नौकरी पर नहीं रखा गया।
संस्थानों की गलती का खामियाजा भुगत रहे विद्यार्थी
उसने कहा कि यूजीसी, विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों की गलती का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है। जब हमने कालेज में एप्लाई किया तब हमने चेक किया था कि यह यूजीसी से अप्रूव्ड है। हमें यह नहीं पता था कि यह पाठ्यक्रम अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद से भी अप्रूव्ड होना चाहिए। यदि ऐसा था तो यूजीसी को उसी समय कालेज को बन्द कर देना चाहिए था। यदि पाठ्यक्रम वैध ही नहीं था तो क्यों चलाया जा रहा है। संस्थान की गलती के लिए दोष छात्रों पर मढऩा गलत है। अधिकांश छात्र जो इन कालेजों से डिग्री कर चुके हैं उनकी उम्र तीस के पार हो चुकी है और अब उनके लिए फिर से परीक्षा पास कर पाना इतना आसान नहीं हैं। इसी कारण 8 हजार छात्रों ने ही फिर से परीक्षा में दाखिला लिया है।

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