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डिजिटल एडिक्शन: व्यस्कों में बढ़ रही मोबाइल और इंटरनेट की लत, बच्चों की संख्या कम

- लत के शिकार लोगों के व्यवहार में आ रहा परिवर्तन

चेन्नई

Updated: May 16, 2022 04:38:08 pm

पुरुषोत्तम रेड्डी @ चेन्नई.

मोबाइल और इंटरनेट के व्यसन (डिजिटल एडिक्शन) की समस्या बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई है। चेन्नई में ओमानदूरार सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में डिजिटल एडिक्शन की समस्या के इलाज के लिए शुरू हुए इंटरनेट डी-एडिक्शन सेंटर में बच्चों की तुलना में व्यस्कों की संख्या अधिक है। 13 दिसम्बर 2021 को शुरू हुए डी-एडिक्शन सेंटर में अबतक 67 मामले आ चुके है जिनमें सर्वाधिक संख्या 44 व्यस्कों की है, इनमें 5 महिलाएं है। वहीं 23 बच्चे जिनमें 15 लडक़े और 8 लड़कियां शामिल है।

डिजिटल एडिक्शन: व्यस्कों में बढ़ रही मोबाइल और इंटरनेट की लत, बच्चों की संख्या कम
डिजिटल एडिक्शन: व्यस्कों में बढ़ रही मोबाइल और इंटरनेट की लत, बच्चों की संख्या कम

इन बच्चों में 10 ऐसे है जिनकी उम्र 5-10 साल के बीच है, जबकि 13 बच्चे ऐसे है जिनकी उम्र 11-18 साल के बीच है। बदलते दौर में स्मार्टफोन का धड़ल्ले से प्रयोग युवाओं, खासकर बच्चों में मोबाइल एडिक्शन के रूप में सामने आया है लेकिन चेन्नई के इंटरनेट डी-एडिक्शन सेंटर के आंकड़ें चिंतित करने वाले है।

गंभीर है समस्या
स्टेनली सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मनोवैज्ञानिक विभाग के प्रोफेसर डा. एलेक्जेंडर ने कहा कि मोबाइल और इंटरनेट के व्यसन (डिजिटल एडिक्शन) की समस्या कोविड लॉकडाउन के बाद एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई है। मोबाइल गेम, इंटरनेट मीडिया, वीडियो स्ट्रीमिंग, चैटिंग समेत तमाम वेब आधारित गतिविधियों की लत लोगों के व्यवहार और जीवन पर नकारात्मक असर डाल रही है। बच्चों में तेजी से बढ़ रहा ऑनलाइन गेमिंग का चलन उन्हें किसी कदर अपनी गिरफ्त में ले रहा है, जिससे बच्चे पढऩा बंद कर रहे। स्कूल जाना कम कर दिया। उन्हें भूख कम लगती है। अभिभावकों की बात अनदेखी कर रहें।

रोजाना 4-5 मामले, सेहत पर असर
प्रोफेसर एलेक्जेंडर ने बताया कि अस्पताल के मेंटल हेल्थ सेंटर की ओपीडी में रोजाना चार से पांच बच्चे ऐसे आ रहे हैं जिन्हें फोन एडिक्शन हो गया है। इनमें अधिकतर 13 से 18 साल की उम्र के हैं। मनोरोग विशेषज्ञों की सहायता से बच्चों का इलाज़ किया जा रहा है। उनके अभिभावक उनके व्यवहार को लेकर चिंतित है। एक हद लत के कारण बच्चे रात में सोते भी नहीं हैं। अगर उन्हें गेम खेलने से रोका जाता है तो कभी-कभी वो हिंसक भी हो जाते हैं। फोन पर ज्यादा समय गुजारने से बच्चों को गर्दन में दर्द और आंखों में परेशानी का भी सामना करना पड़ सकता है।

इनका कहना है-
बच्चे गेम, वीडियो और वेब व ऐप पर उपलब्ध आभासी (वर्चुअल) दुनिया में जी रहे हैैं। उन्हें इससे निकालना जरूरी है। इसके लिए माता-पिता व घर के अन्य सदस्य बच्चों के साथ समय बिताएं।
- आर. जयंती, डीन
ओमानदूरार मेडिकल कॉलेज अस्पताल

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