-नई शिक्षा नीति के मसौदे पर राजस्थान पत्रिका की ओर से परिचर्चा

-नई शिक्षा नीति के मसौदे पर राजस्थान पत्रिका की ओर से परिचर्चा

Ashok Rajpurohit | Updated: 04 Jun 2019, 04:25:46 PM (IST) Chennai, Chennai, Tamil Nadu, India

तमिलनाडु में त्रिभाषाई फॉर्मूले को लागू करना आसान नहीं
-नई शिक्षा नीति के मसौदे पर राजस्थान पत्रिका की ओर से आयोजित परिचर्चा में शिक्षाविदों ने रखी अपनी राय

चेन्नई. आखिरकार मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2019 में गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी सीखने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है। सरकार ने कहा, अब नई शिक्षा नीति में हिंदी भाषा को विकल्प के तौर पर रखा गया है और इस पर किसी तरह का विवाद नहीं होना चाहिए। दक्षिण के राज्यों में राजनीतिक दलों ने कहा था कि सरकार नई शिक्षा नीति-2019 में हिंदी भाषा को जबरन थोपना चाहती है। इसके बाद त्रिभाषाई विवाद पूरी तरह से राजनीतिक हो गया था। शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में दक्षिण के राज्यों में तीन भाषा फॉर्मूला लागू करने में हिंदी भाषा को अनिवार्य किए जाने के बाद मचे बवाल के बाद सरकार नीति में बदलाव करने को मजबूर हुई। अब हिंदी अनिवार्य की शर्त हटा दी गई है। पहले तीन भाषाई फॉर्मूले में अपनी मूल भाषा, स्कूली भाषा के अलावा तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी को अनिवार्य करने की बात कही गई थी, लेकिन सरकार ने अब इस ड्राफ्ट में बदलाव किया है। अब स्कूली भाषा एवं मातृ भाषा के अलावा तीसरी भाषा का जो चुनाव होगा उसमें विद्यार्थी अपनी मर्जी के अनुसार चयन कर सकेंगे। कुछ दिनों पहले ही कस्तूरीरंगन समिति ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय मंत्री को नई शिक्षा नीति का मसौदा सौंपा था। जिसके बाद से भाषाई विवाद पूरी तरह से राजनीतिक हो गया। दक्षिण भारत की राजनीतिक पार्टियों ने केन्द्र सरकार पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया। हालांकि सरकार ने बचाव में कहा कि यह सिर्फ ड्रॉफ्ट है और फाइनल नीति नहीं है। सरकार ने आश्वास्त किया कि किसी पर भाषा थोपी नहीं जाएगी। सरकार के एक मंत्री ने भी टिप्पणी की थी कि एचआरडी मंत्री को सौंपी गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति महज एक मसौदा रिपोर्ट है। आम जनता से प्रतिक्रिया ली जाएगी। राज्य सरकारों से परामर्श किया जाएगा। इसके बाद ही मसौदा रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा। केन्द्र सरकार सभी भाषाओं का सम्मान करती है। कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।
राजस्थान पत्रिका की ओर से नई शिक्षा नीति के मसौदे को लेकर आयोजित की गई एक परिचर्चा के दौरान महानगर के शिक्षाविदों ने अपनी बेबाक राय दी। साथ ही तमिलनाडु मे हिंदी की दशा एवं दिशा को लेकर भी चर्चा की गई।
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न दें भाषा को राजनीति का आवरण
उत्तर भारत एवं दक्षिण की यदि बात की जाए तो कहीं न कहीं संस्कृति लगभग एक सी ही प्रतीत होती है। जरूरत केवल इस बात की है कि लोगों में जागरुकता पैदा की जाए। जहां तक भाषा का सवाल है उसे राजनीतिक आवरण नहीं दिया जाना चाहिए। भाषा अपनी जगह है। भाषा की अपनी महत्ता है। भाषा की एक मिठास है। भाषा हमारी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। सबसे पहले तो मातृभाषा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके बाद राष्ट्रभाषा का स्थान हो। फिर चूंकि ग्लोबलाइजेशन का जमाना है इसलिए विश्व स्तरीय कोई भाषा सीखना भी जरूरी होता है। हम बच्चों पर सारी भाषाएं लाद नहीं सकते। कोई भाषा थोपना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है। अब वक्त बदल रहा है। बच्चों को किसी भी भाषा को सीखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसके साथ ही हमें आने वाला समय भी देखना चाहिए। एक भाषा यदि कोई भी अच्छी तरह सीख ले तो उससे अन्य भाषाएं सीखी जा सकती है। इस तरह की तकनीक आ चुकी है। सरकार की यह सोच अच्छी हो सकती है कि हिंदी के माध्यम से सबको जोडऩे का प्रयास हो रहा है लेकिन हिंदी को थोपा जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है।
-रेणु आर्या अग्रवाल, लेखिका एवं गीतकार।
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तमिलनाडु में द्विभाषाई फॉर्मला अधिक बेहतर
एक महीने से अध्ययन कर रहा हूं। हिंदी का विरोध नहीं बल्कि भाषा का राजनीतिकरण हो रहा है। हमारी समझ से तमिलनाडु में त्रिभाषाई फॉर्मूला सफल नहीं होगा। यहां द्विभाषाई फॉर्मूला ही अधिक बेहतर है। तमिलनाडु में दबाव न डाला जाए। 2006 में तमिल एक्ट लागू किया गया था। इसके तहत तमिल भाषा का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया। इसे लेकर न्यायालय में मामला लंबित है। हर साल परीक्षा से ऐन पहले बच्चों को छूट मिल जाती है। इस समस्या से तमिलनाडु में अन्य प्रदेशों से आए छात्र लगातार जूझ रहे हैं। भले ही बच्चों पर तमिल भाषा पढऩे का दबाव डाला जाता है लेकिन असल में वे सीख नहीं पाते हैं। केन्द्र सरकार इसलिए दबाव न डाले बल्कि कह दे कि जिन्हें इच्छा हो वे पढ़ें। इसके साथ ही राज्य सरकार को भी चाहिए कि वह 2006 से पहले जो नीति थी उसके अनुसार ही तमिल में छूट का प्रवाधान लागू करें।
-डॉ. सी.एल. पाठक, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य।
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पहले भी हिंदी की अनिवार्यता नहीं हुई थी सफल
यदि त्रिभाषाई फॉर्मूला लागू करना चाहें तो भी यह हो कि जिसे पढऩा हो वह पढ़े, जो पढऩा नहीं चाहता हो उसके लिए अनिवार्यता न हो। लोग हिंदी सीखना चाहते हैं लेकिन राजनीतिक हथकंडा बना दिया है कि हिंदी थोपी जा रही है। तमिलनाडु में शिक्षा की नीति राजनीतिक रूप ले चुकी है। इससे पहले 1965 में ही हिंदी को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया गया था। लेकिन तब भी ऐसा हो नहीं सका था। ऐसे में यह भी हो सकता है कि यहां के राजनीतिक दलों की समझ में दो भाषाओं का फार्मूला सही हो। त्रिभाषाई फॉर्मले को लागू किया जाता है तो अच्छा है लेकिन तमिलनाडु में त्रिभाषाई फॉर्मूला चलना बहुत मुश्किल है। वैसे तमिलनाडु में ही पढ़े लोगों ने हिंदी में पुस्तकों का लेखन किया है।
-डॉ. चुन्नीलाल शर्मा, सेवानिवृत्त हिंदी प्रोफेसर, ए.एम. जैन कॉलेज।
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रोजगार की दृष्टि से अपना महत्व हैं हिंदी का
किसी भी क्षेत्र में हिंदी की अहमियत है। व्यापार समेत हर क्षेत्र में हिंदी की मांग लगातार बढ़ी है। समूचे भारतीय बाजार में हिंदी का अपना दबदबा रहा है। रोजगार की दृष्टि से देखा जाए तो हिंदी का अलग महत्व है। रोजमर्रा के जीवन में हिंदी का अपना अलग स्थान रहा है। वैसे देखा जाए तो आज हिंदी समूचे विश्व में फैल चुकी है। तमिलनाडु की भी यदि बात की जाए तो यहां स्कूलों एवं कॉलेजों में न केवल हिंदी पाठ्यक्र म व विभाग हैं बल्कि विद्यार्थियों की खासी दिलचस्पी भी देखी गई है।
-सरिता खेमका, राजस्थानी एसोसिएशन की महिला शाखा गणगौर की पूर्व चेयरपर्सन।

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