धर्म व त्याग के अवसर को खोना नहीं

धर्म व त्याग के अवसर को खोना नहीं

Santosh Tiwari | Publish: Sep, 05 2018 11:35:58 AM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

भोजन से पहले व घर से निकलने से पहले नवकार मंत्र का जाप करना चाहिए। इसका स्मरण किए बिना किसी भी कार्य की शुरुआत ही नहीं करनी चाहिए। यदि मनुष्य अपना जीवन सुधारना चाहता है तो उसे धर्म, ध्यान, तप और त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा पंचपरमेष्ठि की भक्ति स्तुति और प्रार्थना जब भी करने का मौका मिले तो मन और दिल को उसी में जोडक़र परमात्मा की दिव्य भक्ति का लाभ ले लेना चाहिए। ऐसी उत्तम अनन्य भक्ति कर जीवन को परमात्मा की वाणी से जोडऩे का अवसर भाग्यशाली आत्माओं को ही प्राप्त होता है। संसार के समस्त कार्यों को छोडक़र परमात्मा की भक्ति में लगने वाले लोग सौभाग्यशाली होते हैं। जैनों के लिए नवकार मंत्र ६८ तीर्थ का लाभ देने के बराबर होता है। भक्ति के साथ अगर नवकार मंत्र का स्मरण किया जाए तो कहीं जाने की जरूरत नहीं है बल्कि इससे ही ६८ तीर्थ का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
सागरमुनि ने कहा आचरण का जीवन में बहुत महत्व है। आत्मा के हित के लिए सदाचरण करना चाहिए। आचरण के मार्ग पर चल कर जीवन बदला जा सकता है। अच्छा आचरण ही मानव को धर्म की ओर खींचता है। इससे पहले संघ के तत्वावधान में मिश्री चैरिटेबल ट्रस्ट कोडम्बाक्कम द्वारा अंतर्विद्यालयी भाषण प्रतियोगिता हुई जिसमें ६० स्कूली बच्चों ने हिस्सा लेकर महावीर के पांच सिद्धांतों पर प्रस्तुति दी। विशेषता यह रही कि सभी अजैन बच्चों ने जैन धर्म के बारे में बताया। मुख्य अतिथि पन्नालाल सिंघवी थे। संघ के अध्यक्ष आंनदमल छल्लाणी के अलावा जवरीलाल भंडारी, महावीर टोटलवा, संजय कुकड़ा, रिखबचंद बोहरा सहित अनेक लोग उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया।
--------------

प्रीति की परंपरा प्रकट करती है नीति
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयज ने कहा इंद्रधनुष के समान चपल कांति वाले प्राण भले चले जाएं, चंचल संपदाएं, पानी के बुलबुले की तरह पिता, पुत्र, मित्र, स्त्री आदि के संबंध भी हमसे दूर हो जाएं, नदी के वेग के समान चंचल शरीर की जवानी एवं गुण भी चले जाएं, लेकिन हमारी कीर्ति फैलाने वाले नीति-न्याय का संग कभी छूटना नहीं चाहिए। नदी का प्रवाह जिस तरह बिना किसी उपाय के नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है। जिस प्रकार संबंधीजन प्रीति से, तालाब कमलों से, सेना वेगवान घोड़ों से, नृत्य सुरताल से, घोड़े वेग से, सभा विद्वानों से, मुनि शास्त्रों से, शिष्य विनय से और कुल पुत्रों से सुशोभित होता है, वैसे ही राजा न्याय से शोभायमान होता है। नीति कीर्ति रूपी स्त्री को रहने के लिए घर है, प्रसिद्धि पाने वाली है, पुण्य रूपी राजा की प्रिय रानी है, लक्ष्मी का संग करने वाली, सद्गति का मार्ग दिखाने वाली दीपज्योति समान है, कल्याण की सखी, प्रीति की परंपरा को प्रकट करने वाली और विश्वास का स्थान रूप है। सज्जन पुरुष न्याय मार्ग पर चलते हुए पूजनीय लोगों की सेवा करता है, धार्मिक प्राणी को कभी ठगता नहीं, सत्य बोलता है, अनुचित आचरण का त्याग करने के साथ संबंधियों से प्रेम रखता है, संत संगति करता है, करने योग्य दैनिक कर्तव्यों का पालन करता है, प्रतापी पुरुषों से स्नेह पूर्वक व्यवहार करता है तथा दीन और अनाथ की मदद करता है।
-------------
पौषध है आत्मा की सर्जरी
चेन्नई. दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा भगवान महावीर ने पर्यूषण की दो जरूरी बातें बताई है सामयिक और पौषध। स यानी साधना-समता की साधना करें, म यानी ममता को छोडं़े। य अर्थात यतना, जीवन में यतना से चलें। क यानी करुणा-सभी जीवों के प्रति दया रखें। दूसरा है पौषध- यह दो प्रकार की होती है-देशा बगासिक और प्रतिपूर्ण पौषध। पौषध करना यानी आत्मा का पोषण करना। आजकल सब शरीर का पोषण करते हैं। इन आठ दिनों में आत्मा का पोषण करें। सामायिक प्रतिक्रमण पौषध करें। जिस तरह हार्ट सर्जरी करते हैं,उसी तरह पौषध से आत्मा की सर्जरी होती है। इन आठ दिनों में इंद्रियों को ब्रेक दें। जिस प्रकार पाटे के चार पायों में से एक पाया नहीं होने से पाटा डगमगाने लगता है इसी तरह डगमग जीवन को संतों के समागम से स्थिर बनाएं।
हमारे जीवन से आदर्श और मर्यादा गुम हो गई है। यह हमें समझ नहीं आ रहा है कि हमारा जीवन बनावटी हो गया है। संसार में आनंद सुख नहीं है। भक्ति का एक छोटा सा दीपक जलाएं आपका जीवन संवर जाएगा। आजकल सब भविष्य सुधारने में व्यस्त हैं इस बात से अनजान कि अगर वर्तमान सुधार लिया तो भविष्य भी सुधर जाएगा। जीवन का महत्व जो नहीं समझता वह जीवन भर भटकता रहता है।
-------------

ज्ञान बिना किया गया कार्य अनैतिक
चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि इस लोक में ज्ञान के समान कोई वस्तु नहीं है। भगवान महावीर ने आत्म साधना के लिए ज्ञान को परम आवश्यक माना है। कैवल्य ज्ञान सूर्य प्रकाश से ज्यादा प्रकाश करता है। सूर्य तो मृत्यु लोक प्रकाश देता है पर कैवल्य ज्ञान तीनों लोकों को प्रकाशित करता है। सूर्य को बादल ढंक सकता है, राहु ग्रस्त कर सकता है और सूर्य अस्त होता है पर कैवल्य ज्ञान का अस्त कभी नहीं होता। ज्ञान बिना किया गया कार्य अनैतिक है। ज्ञान श्रद्धावान को प्राप्त होता है।
साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि मानव को सदैव उत्तम पुरुषो की संगति करना चाहिए क्योंकि सज्जनों की संगत हमारे संताप व परिताप का हरण चित्त को शांति प्रदान करती है। आलसी, वैर विरोध रखने वाले और स्वेच्छाचारी का साथ छोड़ देना चाहिए। दुर्जनों का संग देने से सज्जन का भी महत्व गिर जाता है। जीवात्मा को पुण्यों से सज्जनों की संगति प्राप्त होती है। सत्संग से कुमति दूर हो जाती है, चित्त में संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। सत्संग से सारी अच्छाई और भलाई खुद ही मिल जाती है। धर्म सभा का संचालन सज्जनराज सुराणा ने किया।

स्व को जानना ही है सर्व को जानना
चेन्नई. एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि जिज्ञासा दो प्रकार की होती है स्व जिज्ञासा और पर जिज्ञासा। खुद को जानना स्व और जगत को जानना परजिज्ञासा है। जो स्व को जान लेता है वो सर्व को जान लेता है। स्व को नहीं जानता उसका ज्ञान अधूरा है। ज्ञान के महल में प्रवेश पाने के लिए जिज्ञासा पगडंडी है। जैसी जिज्ञासा होगी वैसे गुरु से ज्ञान मिलेगा। जिज्ञासु ग्रहक है और गुरु व्यापारी। जिज्ञासा और ज्ञान का गहरा नाता है। गुरु रूपी सागर में ज्ञान के अनेक मोती है। शिष्य रूपी गोताखोर को जिज्ञासा रूपी पनडुब्बी से ज्ञान के मोती प्राप्त कर सकता है। महावीर भगवान के इंद्रभूमि के 11 गणधरों का परिचय जिज्ञासा से ही हुआ। जिज्ञासा ऐसी हो जो हमें मोक्षमार्ग के निकट पहुंचा दे। अपूर्वा आचार्य ने कहा कि इच्छा आकाश के समान अनंत है।धन परिमित है, इच्छा का पूर्ण होना असंभव है। लोभी पुरुष को धन धान्य से भरपूर सारा भूमंडल भी दे दिया जाए तो भी उसकी तृष्णा शांत नहीं होगी।

Ad Block is Banned