अनुकरणीय पहल

सोच बदलेगी तो समाज सशक्त होगा

By: Ashok Rajpurohit

Published: 14 Sep 2020, 08:59 PM IST

चेन्नई. आज जब समाज में दिखावा एक स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है और दहेज प्रथा एवं मृत्यु भोज सरीखी सामाजिक कुरीतियां समाज को खोखला कर रही है, ऐसे समय में बरसों से चली आ रही इन कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए राजपुरोहित समाज की पहल अनुकरणीय है। समाज का धनाढ्य वर्ग दहेज प्रथा के नाम पर अनाप-शनाप खर्च करता है। दहेज प्रथा के चक्रव्यूह में उलझकर व्यक्ति ताजिंदगी घुन की तरह पिसता जाता है। जिसकी दहेज देने की हैसियत नहीं होती वह भी समाज के तानों-बानों के डर से क्षमता से बहुत अधिक दहेज का प्रदर्शन करने को मजबूर होता है। मृत्यु भोज के समय बारह दिन तक देशी घी की मिठाइयां बनती है। यदि किसी के पास यह सब करने के लिए पैसा नहीं है तब भी कहीं से कर्ज लेकर यह रस्में निभानी पड़ती है। पंचायती बंदिशे व सामाजिक दबाव इस कदर होता है कि व्यक्ति चाहकर भी उनसे दूर नहीं हो सकता। ऐसे में उसकी सारी उम्र उधारी चुकाने में ही गुजर जाती है।
हकीकत यह है कि जिंदगी की कमाई का एक बड़ा हिस्सा दहेज व मृत्युभोज सरीखी प्रथाओं के नाम पर खर्च कर दिया जाता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और रोटी, कपड़ा व मकान जैसी बुनियादी जरूरतें पीछे छूट जाती है। यानी समाज का एक बड़ा वर्ग न अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला पाते हैं और न ही खुद की जरूरतें पूरी कर पाते हैं।
अब समाज खुलकर इस लड़ाई में आगे आया है। नई पहल के तहत दहेज के लिए किसी तरह का दिखाबा नहीं होगा और मृत्युभोज पर 11 दिन तक सादा भोजन एवं बारहवें दिन केवल एक मिठाई बनेगी। नियम तोडऩे वाले परिवारों का सामाजिक बहिष्कार का निर्णय लिया है। इस निर्णय से न केवल हजारों-लाखों परिवार तबाह होने से बचेंगे बल्कि उनके जीवन में नई खुशहाली आ सकेगी। कुरीतियों के खात्मे में अक्सर सरकार का ढुलमुल रवैया रहा है। ऐसे में सामाजिक पहल निश्चित ही कुरीतियों को मिटाने में अहम किरदार निभाएगी। अब अमीर-गरीब के बीच खाई मिट सकेगी और समाज में परिवर्तन की बयार बह सकेगी।
सामूहिक फैसले ही समाज को आगे ले जा सकते हैं। केवल कानून व सरकार के भरोसे कुरीतियों का खात्मा नहीं हो सकता। सामाजिक स्तर पर पहल जरूरी है। दिखावे की संस्कृति किसी भी लिहाज से उचित नहीं मानी जा सकती है। निश्चित ही समाज ने बदलाव की क्रांतिकारी पहल की है। इससे अन्य समाज भी प्रेरित होंगे। बदले जमाने में हमें अपनी सोच को बदलने की जरूरत है। सोच बदलेगी तो समाज सशक्त होगा और बदलाव की राह तेज होगी। बदलाव की यह आंधी निश्चित ही आने वाले समय में जरूर गुल खिलाएगी।

Ashok Rajpurohit
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