हिंदी को थोपने के बजाय उसकी जरूरत को समझाएं

हिंदी को थोपने के बजाय उसकी जरूरत को समझाएं

shivali agrawal | Publish: Jun, 12 2019 03:39:19 PM (IST) Chennai, Chennai, Tamil Nadu, India

केंद्र सरकार द्वारा जब से त्रि-भाषीय फार्मूला लागू करने की घोषणा की है उसके बाद से तमिलनाडु में इसका खासा विरोध देखने को मिल रहा है।

चेन्नई. केंद्र सरकार द्वारा जब से त्रि-भाषीय फार्मूला लागू करने की घोषणा की है उसके बाद से तमिलनाडु में इसका खासा विरोध देखने को मिल रहा है। कई राजनीतिक पार्टियां, नेता, फिल्मी हस्तियां व आमजन इस फैसले के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करने में लगे हैं। हालांकि तमिलनाडु भाजपा इकाई के नेता केंद्र सरकार के इस फैसले को सही बता रहे हैं। पत्रिका ने इस बारे में कुछ शिक्षाविद और राजनेताओं से उनका पक्ष जानने की कोशिश की। प्रस्तुत है उनकी बातचीत के कुछ अंश।

 


हिंदी को तमिलनाडु पर थोपने के बजाय इस बात पर विशेष ध्यान देना जरूरी है कि कैसे हम लोगों को उसकी जरूरत के बारे में समझाएं। यह कहना है वीआईटी शिक्षण संस्थान के संस्थापक जी. विश्वनाथन का। पत्रिका ने जब उनसे पूरे प्रकरण पर बात की तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह नियम आज का नहीं है, सबसे पहले वर्ष १९६८ में यह फार्मूला लागू किया गया था। इस फार्मूले के तहत हिंदी प्रदेशों में हिंदी व अंग्रेजी भाषा के बजाय आधुनिक हिंदी भाषा को विकल्प के रूप में पढऩा था जिसमें प्रमुखता दक्षिण भारतीय भाषाओं को दी जानी थी। जिस वक्त इसे लागू किया गया उस वक्त शिक्षा राज्य का विषय होता था लेकिन आपातकाल के बाद यह केंद्र के हाथ में आ गया। अब तक केंद्र में आई सरकारें इस मुद्दे को लेकर कभी भी गम्भीर नहीं रही और अब अचानक नींद खुलने पर मनमानी नहीं की जा सकती। आज का तमिलनाडु दसकों पहले जैसा नहीं है। आज के लोग प्रदेश के बाहरी प्रदेशों में नौकरी व पढ़ाई के लिए जाते हैं और बाहरी प्रदेशों के लोग यहां आते हैं इसलिए यह हमें लोगों पर छोडऩा चाहिए वे किसी भाषा के प्रति अपनी रुचि रखते हैं।

 


मुझे है उर्दू से ज्यादा तमिल की अच्छी जानकारी
तमिलनाडु की श्रममंत्री डा. निलोफर कबील का कहना है कि मेरा प्रेम और ज्ञान उर्दू के मुकाबले तमिल से ज्यादा है। जब उनसे केद्र सरकार के त्रि-भाषा फार्मूले के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया कि मेरा इस मसले पर वही जवाब है जो हमारी सरकार का है। मैं त्रि-भाषा वाले फार्मूले का समर्थन नहीं करती। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में रहना है तो तमिल जानना जरूरी है और तमिलनाडु के लोगों को अपनी भाषा और संस्कृति से काफी प्यार है। ऐसे में कोई तमिलों पर बाहर से कोई अन्य भाषा व अपनी संस्कृति थोपे तो उनको वह बर्दाश्त नहीं होगा। बाहर के राज्यों में क्या तमिल को पढ़ाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने अपने बयानों में कई बार कहा है कि उनकी सरकार सत्ता में आई तो देश के अन्य राज्यों में तमिल भाषा की पढ़ाई भी कराई जाएगी जो अब तक नहीं हुआ है। हमारा यह साफ कहना है कि हम उस फार्मूले को न तो मानेंगे और न ही स्वीकार करेंगे जिसे हम पर थोपने का प्रयास किया जाएगा।

 


कोई भी कितनी भी भाषा सीख सकता है यह व्यक्ति की रुचि पर निर्भर है।
तमिलनाडु में त्रि-भाषा फार्मूला लागू करना असम्भव लगता है लेकिन इससे यह जाहिर नहीं होता कि तमिलनाडु में रहने वाला व्यक्ति तमिल व अंग्रेजी के अलावा और कोई भाषा नहीं पढ़ सकता। आज भी यहां के शिक्षण संस्थानों में फ्रेंच, अरबी, हिंदी जैसे विषयों की पढ़ाई होती है। यह कहना है एसआरएम ग्रुप के संस्थापक और पेरम्बलूर के सांसद डा. टी. आर. पारीवेंदर का। उनका कहना है कि जिसकी जितनी भाषा सीखने एवं पढऩे में रुचि है वह उतनी भाषा पढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि १९६५ में हिंदी के खिलाफ जो आंदोलन हुआ है वह अभी भी तमिल लोगों के जेहन में है। कुछ द्रविड़ पार्टियां सत्ता में इसी मुद्दे को तूल देकर आई हैं। ऐसे में वे पार्टियां हिंदी को तमिलनाडु में आने नहीं देंगी। हां, लेकिन हिंदी सीखने के लिए कोई भी किसी को नहीं रोक रहा है। मैं अपनी ही बात कह दूं कि अब मुझे दिल्ली जाकर संसद में बैठना है जहां लोगों की कही बात समझ में नहीं आएगी इसका कारण है कि मुझे हिंदी का कोई ज्ञान नहीं। अब इस उम्र में मेरे अंदर इच्छा जाग रही है कि मै हिंदी सीखूं।

 


इस मुद्दे के लिए यह सही वक्त नहीं
तमिलनाडु में त्रि-भाषा फार्मूले को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को क्या यही उचित समय मिला था? अभी कई ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर केंद्र सरकार को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। आरणी सीट से जीते कांग्रेस सांसद एमके विष्णु प्रसाद का यही कहना है। वे कहते हैं कि राज्य में जल संकट, निकाह और कई ऐसे मानव जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे हैं जिन पर केंद्र सरकार का ध्यान क्यों नहीं जाता। एनडीए सरकार तमिलनाडु के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार क्यों करती है? इस संवेदनशील मुद्दे को छूने के बजाय जन हितैषी मुद्दों पर पहले काम करना चाहिए। यदि व्यक्ति रहेगा तब जाकर वह भाषा व अन्य चीजों के बारे में सोचेगा। आज तमिलनाडु की जनता जल संकट से जूझ रही है, क्या केंद्र सरकार ने उसके लिए कुछ सोचा है? हम हिंदी के खिलाफ नहीं हैं, खिलाफ इस बात के हैं कि इसे कैसे लागू किया जा रहा है।

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