सिद्धों को भगवान शंकर ने दी योग दीक्षा

नागपट्टिनम जिले के तिरुवाडुदुरै में भगवान शिव का अतिप्राचीन गौमुक्तीश्वरर मंदिर स्थित है। इस मंदिर के भगवान की स्तुति शैव संतों तिरुज्ञानसंबंदर, तिरुण

By: मुकेश शर्मा

Published: 11 Dec 2017, 09:39 PM IST

चेन्नई।नागपट्टिनम जिले के तिरुवाडुदुरै में भगवान शिव का अतिप्राचीन गौमुक्तीश्वरर मंदिर स्थित है। इस मंदिर के भगवान की स्तुति शैव संतों तिरुज्ञानसंबंदर, तिरुणावकरसर और सुंदरर ने की है। कावेरी नदी के दक्षिणी छोर पर यह ३६वां शिवालय है। मंदिर के ब्रह्मोत्सव और अन्नाभिषेक उत्सव पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
गोमुक्तिश्वरर का शिवलिंग स्वयंभू है। भगवान शंकर के वाहन नंदी का आकार अपेक्षाकृत बड़ा है। यह क्षेत्र संत तिरुमूलर की जीवित समाधि के लिए भी जाना जाता है। मंदिर का प्रशासन तिरुवाडुदुरै आदिनम के अधीन है और इसका दूसरा नाम श्री मासिलामणि ईश्वरर मंदिर भी है।

पौराणिक कथा

संत तिरुज्ञानसंबंदर एक बार यहां अपने पिता शिवपद हृदयर के साथ आकर बसे। वे सिरकाली में यज्ञ करना चाहते थे। उन्होंने अपने संत पुत्र से समिध लाने को कहा। तिरुज्ञानसंबंदर ने भगवान शिव से प्रार्थना करते हुए दस भक्ति गीत गाए ताकि हवन सामग्री और स्वर्ण की व्यवस्था हो सके। भगवान प्रसन्न हुए और वहां स्वर्ण मुद्राएं छोड़ गए। वह पीठ जहां शिवपद हृदयर ने यज्ञ किया था आज भी मंदिर परिसर में है। यहां की गई प्रार्थना अत्यंत शुभफल प्रदायी मानी जाती है।

एक अन्य जातक कथा के अनुसार शिव के अनन्य भक्त तिरुमालिगै थेवर यहां शिव पूजा में रत थे। सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास कर वहां के राजा ने अपने सैनिकों को उन पर आक्रमण के लिए भेजा।

मां अम्बिका ने शिव से विनती की कि तिरुमालिगै को बचाएं। भगवान शिव नंदी की सेना मुकाबले के लिए भेजी। सभी नंदियों ने मिलकर विशालकाय नंदी का आकार ग्रहण किया और सेना को खदेड़ दिया। मंदिर की नंदी का आकार १४ फीट तीन इंच है। बड़ी नंदी के साथ ही छोटी नंदी भी है। प्रदोषकाल में यहां महाभिषेक होता है।

मंदिर से जुड़ी एक अन्य जनश्रुति तिरुमूलर की है। एक बार कैलाश पर्वत से शिव भक्त सुंदरनाथर भूलोक के शिवालयों के दर्शन करते हुए इस क्षेत्र में पहुंचे। उन्होंने मूलन नामक के गड़रिये को मृत पाया जिसके चारों तरफ गायों का झुण्ड था जो अत्यंत निराश मुद्रा में थी।

सुंदरनाथ अपने योगबल से मूलन के शरीर में प्रवेश कर गए और गायों को घरों तक पहुंचाया। फिर वह यहां शिवाराधना में लीन हो गया और तिरुमूलर कहलाया। कहा जाता है कि तिरुमूलर अपनी साधना से साल में एक बार उठता था और शिव भक्ति दर्शन का एक गीत गाकर फिर तपस्या में लीन हो जाता।

इस तरह उसने ३ हजार सालों में ३ हजार भक्ति गीत गाए। इनको तिरुमूलर तिरुमंत्रम कहा जाता है। अंत में वे शिवलिंग में समा गए। यह मान्यता है कि भगवान शिव ने नवकोटि सिद्धों को इसी क्षेत्र में योग शक्ति की दीक्षा दी थी। इसी पुण्य स्थल में शिव ने उनके शाप से गाय बनीं मां पार्वती को मुक्ति दी और गौमुक्तिश्वर कहलाए।

विशेष आकर्षण

सम्राट मुष्कंद चक्रवर्ती नि:संतान होने से निराश था। वह देवराज इंद्र द्वारा दिए गए भगवान त्यागेशर की पूजा करता था। भगवान शिव उनके स्वप्न में आए और इस क्षेत्र में आकर संतान प्राप्ति की कामना के लिए पूजा करने को कहा। भोलेनाथ की कृपा से उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। आज भी संतान की कामना को लेकर त्यागेशर सन्निधि में श्रद्धालु प्रार्थना करते हैं। गोमुक्तिश्वरर की उत्सव मूर्ति का नाम अनैतू इरुंद नायकर है।

मंदिर का इतिहास और संरचना

यह मंदिर भी करीब दो हजार साल पुराना माना जाता है। मंदिर का गोपुरम पांच मंजिला है जिसके सामने ही सरोवर है। इस क्षेत्र का पुरातन नाम नंदी नगर, नवकोटि चित्रपुरम था जो अब तिरुवाडुदुरै है। मंदिर के विशाल परिसर में सभी देवी-देवताओं की सन्निधियां हैं। राजगोपुरम के ऊपर बना गुम्बद द्वैदल शैली का है। मंदिर के विनायक तुनैवंद विनायक (रक्षक गणेश) के नाम से पूजे जाते हैं। मंदिर के नाम के अनुरूप परकोटे में एक गाय की मूर्ति है जो शिवलिंग पर दूध अर्पित कर रही है। इसकी पूजा गोरूपाम्बिका के रूप में होती है। पास मेें शनि भगवान की मूर्ति है। मंदिर में तीन सूर्य भगवान हैं जिनके दर्शन दुर्लभ माने जाते हैं। मंदिर का आदिवृक्ष बड़ का है। देवी पार्वती की ओप्प्पिलीमुलै नाम से सन्निधि है। गोमुक्ति, कैवल्य और पद्म तीर्थ नाम से जलकुण्ड हैं।

मुकेश शर्मा Reporting
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