Tamilnadu: महात्मा गांधी ने भी सीखी थी ये भाषा, जानिए क्यों

Tamilnadu: महात्मा गांधी ने भी सीखी थी ये भाषा, जानिए क्यों
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shivali agrawal | Updated: 14 Sep 2019, 07:59:38 PM (IST) Chennai, Chennai, Tamil Nadu, India

Hindi: world's leading international language: आज हम हिन्दी के द्वारा कश्मीरी भाषा से लेकर तमिल तक सभी भाषाओं के साहित्य से परिचित हैं। साहित्य के द्वारा हर एक प्रदेश के लोक-जीवन संस्कृति तथा रीति रिवाज से हमारा साक्षात्कार हुआ। यह काम हिन्दी ही कर सकती है, अंग्रेजी नहीं।

गांधी जी ने खादी और मातृभाषा को देश की आजादी के साथ जोड़ कर देखा था। उनका मानना था कि विद्या का माध्यम मातृभाषा ही होनी चाहिए न कि अंग्रेजी।

यह दूसरी बात है कि जब भारत का संविधान बन रहा था तब Hindi के पक्षधर भी संविधान सभा में अंग्रेजी में ही बोल रहे थे। संविधान का प्रारूप अंग्रेजी में ही बना था और इसी कारण बहस भी अंग्रेजी में हुई और मातृभाषा का पक्ष भी अंग्रेजी के माध्यम से ही रखना पड़ा।
भारत में भाषा नियोजन को लेकर अनेक विवाद व भ्रम हैं। पहला विवाद तो ‘भाषा’ और बोली’ को लेकर है। शुद्ध भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से ‘भाषा’ और ‘बोली’ में कोई अन्तर नहीं है और किसी बोली को ‘भाषा’ का दर्जा या ‘भाषा’ को बोली का दर्जा भाषा वैज्ञानिक कारणों से तय होता है- यानि धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक कारणों से।

खड़ी बोली ‘बोली’ से कैसे भाषा का स्तर पा सकी और कैसी ब्रज ‘भाषा’ से बोली के दर्जे तक पहुंची। यह सब इन्ही कारणों का प्रभाव है। यूं यदि आपस में सम्बोधि को आधार माना जाए तो किसी ‘बोली’ के वक्ताओं में ‘भाषा’ के बोलने वाले की तुलना में परस्पर सम्बोधि अधिक होती है।

प्रत्येक वक्ता के दो वृत्त होते हैं- एक श्रवण और दूसरा अभिव्यक्ति का। ‘बोली’ के दो वक्ताओं के बीच में ये वृत्त अधिकांश एक से होते हैं जबकि ‘भाषा’ के बोलने वाले दो वक्ताओं के बीच में ये वृत्त कुल मिलाकर एक पैटर्न तो बनाते हैं पर इनमें समानता का क्षेत्र कम ही होता है।

एक बात और है कि प्रत्येक वक्ता का श्रवण का वृत्त बहुत बड़ा होता है और अभिव्यक्ति का वृत्त उसकी अपेक्षा छोटा होता है यानि किसी ‘भाषा’ या ‘बोली’ का जितना अंश हम समझे हैं, उतना अभिव्यक्त नहीं कर पाते।

पर ‘भाषा’ और ‘बोली’ में एक बड़ा अन्तर स्थानीयता को लेकर है।किसी भी ‘बोली’ में देशज अभिव्यक्ति शब्दावली और वाक्य संरचना के स्तर पर जितनी समाज से जुड़ी होती है, उतनी ‘भाषा’ की अभिव्यक्ति में नहीं।

भाषा के जो दो रूप होते है -‘साधु’ और ‘चलित’ या वैध और ‘वास्तविक’ या ‘फोरमल’ और ‘इनफोरमल’, उसमें भाषा साधु, वैध और फोरमल की तरफ झुकी रहती है और बोली चलित, वास्तविक और इनफोरमल की ओर।

यदि हम यह समझ लें कि भाषा या बोली का सम्बन्ध उस समाज की संस्कृति और संस्कार से होता है तो हम अपने परिवेश की भाषा या बोली को ही समाज के संचालन में काम में लाएंगे। समाज की रीति-नीति, आचार-विचार, धर्म, संस्कृति और संस्कार यानि पूरे समाज की सोच की अभिव्यक्ति अपनी बोली में ही सम्भव है।

अत: यह समझना जरूरी है कि भाषा या बोली का प्रश्न व्यवसाय, व्यापार या राज-काज से बढक़र अपने जातीय सोच से है और जो कुछ भी उसमें देशज है उसकी अभिव्यक्ति आयातित भाषा से नहीं हो सकती।

भाषा या बोली किसी समाज के जनजीवन, संस्कृति, लोक - व्यवहार, धर्म आचरण और समस्त कार्यकलापों का लेखा जोखा होती है। भाषा और संस्कृति का गहरा संबंध है, न केवल शब्दावली के स्तर पर अपितु वाक्य संरचना के स्तर पर भी उस क्षेत्र की संस्कृति उस भाषा से परिलक्षित होती है।

भारतीय परंपरा में शब्द को ब्रह्म माना गया है। दुनिया का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि अनेक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के पीछे शब्द की भूमिका और प्रेरणा रही है। यही बात दूसरी तरह से भी कही जा सकती है कि अनेक बार शब्द की शक्ति से नई चेतना पैदा की है, इतिहास को नया मोड़ दिया है।
भारतेंदु हरिष्चन्द्र ने कहा था-

निज भाषा उन्नति अहै
सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान
मिटत न हिय का शूल


लेकिन भारत जैसे विशाल देश में एक संपर्क भाषा का होना अत्यंत जरूरी है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के सिलसिले में जब बहुभाषा - भाषी भारतीय जनता को स्वतंत्रता का संदेश दे रहे थे तब उन्हें लगा कि अगर भारतीयों के कंठों से एक ही भाषा निकले तो वह देश की एकता के लिए सुगम बनेगी। इसीलिए उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भाषा को भी एक माध्यम के रूप में चुना था और वह था ‘हिन्दी’ भाषा।

भारत में भाषाओं की विवधिता है। लेकिन अनादि काल से भूगोल, इतिहास संस्कृति और भाषाएं अलग-अलग होते हुए भी भारत एक देश ही रहा है।

संास्कृतिक सीमाएं कितनी भी मर्यादित क्यों न हो, दक्षिण में रहने वाला, भारतीय गंगमैया और नगाधिराज हिमालय की यात्रा करने में जो सुख और श्रद्धा का अनुभव करते है उसी भक्ति भाव से उत्तर भारत के लोग उत्तर के पवित्र तीर्थों की यात्रा करते हुए उसी श्रद्धा से दक्षिण में रामेश्वरम, गोकर्ण तथा अन्य तीर्थों की भी यात्रा करते है।

गांधीजी ने जब हिन्दी को सम्मानित किया तब उनके विचार स्पष्ट थे। वे जानते थे, भारत जैसे वैविध्यों से भरे हुए विशाल जन-समूह की एकता के बिना, स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता और इस एकता को प्रस्तावित करने का काम केवल हिन्दी ही कर सकती है। इसलिए उन्होंने स्वयं हिन्दी सीखी और भारत में हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।

स्थानीय भाषाएं हटाकर लोगों पर हिन्दी थोपने का सवाल ही नहीं था। उल्टा जैसा कि संविधान में लिखा हुआ है - हर क्षेत्रीय भाषा का जितना विकास होगा, उतनी ही हिन्दी भी समृद्ध होगी, क्योंकि राज्य पर उस राज्य की भाषा सार्वभौम रहेगी और राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी, संस्कृति के समन्वय का काम करेगी।
आज हिन्दी भाषा यह काम बड़ी सफलता से कर रही है। क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय मंच पर ले आने का कार्य जब से हिन्दी ने शुरू किया तब से हिन्दी की शक्ति, शब्दावली अधिक व्यापक हुई है।

आज हम हिन्दी के द्वारा कश्मीरी भाषा से लेकर तमिल तक सभी भाषाओं के साहित्य से परिचित हैं। साहित्य के द्वारा हर एक प्रदेश के लोक-जीवन संस्कृति तथा रीति रिवाज से हमारा साक्षात्कार हुआ। यह काम हिन्दी ही कर सकती है, अंग्रेजी नहीं।
हमारा एक राष्ट्रगान है, एक संसद है। लेकिन आश्चर्य है कि हमारे पास हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है और जब एक तक हम हिन्दी को उसका अधिकार नहीं देंगे तब एक भारत की संस्कृति सही अर्थों में पूर्णत: विकसित नहीं होगी।
जबतक राष्ट्रीय भाषाओं को हमारे हृदय में प्रतिष्ठा और मान नहीं मिलेगी तब तक भारतीय संस्कृति की बातें करने से हम कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे।
भारतीय भाषाओं में भाषाई और वैचारिक समानता को सही तौर पर परखने के लिए आदान-प्रदान के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस आदान-प्रदान में हिन्दी ही कारगर भूमिका निभा सकती है। गैर भारतीय भाषा को प्रथम मातृभाषा का दर्जा देना उसी मानसिक गुलामी का द्योतक है जो पिछले दो सौ वर्षों से हमारे बुद्धिजीवियों के खुन में घुल मिल गई है।

सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर, हम हिन्दी को राष्ट्रभाषा का ही नहीं, विश्व की अग्रणी अंतर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिलाएं - तभी विश्व मंच पर हमारी अपनी पहचान बनेगी। हिन्दी नहीं पनपेगी तो शेष भारतीय भाषाएं भी स्वत: निष्प्राण हो जाएंगी।


प्रो.प्रदीप के. शर्मा

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