अब जगी जिन्दगी की उम्मीद!

डचेन मस्कुलर डिस्ट्रोफी (डीएमडी) से ग्रसित महानगर के वेंकटरमण को २४ साल के लम्बे इंतजार के बाद जीवन की आस जगी है। चेन्नई निवासी २५ वर्षीय वेंकटरमण जन्

By: मुकेश शर्मा

Published: 18 Aug 2017, 10:38 PM IST

चेन्नई। डचेन मस्कुलर डिस्ट्रोफी (डीएमडी) से ग्रसित महानगर के वेंकटरमण को २४ साल के लम्बे इंतजार के बाद जीवन की आस जगी है। चेन्नई निवासी २५ वर्षीय वेंकटरमण जन्म से ही डीएमडी नामक घातक बीमारी से जूझ रहे हैं। इस रोग में मांसपेशियों के कमजोर पडऩे के कारण शरीर का विकास रुक जाता है और युवावस्था में रोगी की मौत हो जाती है। लेकिन वेंकटरमण ने उम्मीद और जीने के जज्बे को बनाए रखा और बीमारी के आखिरी चरण पर मौत को मात दे दी। यह संभव हो पाया है स्टेम सेल थैरेपी और योग के साथ नियमित व्यायाम से। डीएमडी बीमारी लाइलाज है। स्टेम सेल थैरेपी से बीमारी पर काबू किया गया।

पिछले आठ साल में वेंकटरमण ने दस बार इस थैरेपी का उपयोग किया जो उसके लिए अचूक औषधि साबित हुई। मुम्बई स्थित न्यूरोजेन ब्रेन एंड स्पाइन इंस्टीट्यूट के उप निदेशक डा. नंदिनी गोकुलचंद्रन ने यहां पत्रकारों को बताया कि डीएमडी जानलेवा बीमारी तीन साल से कम उम्र के बच्चों में होती है जो जेनेटिक डिसऑर्डर के कारण होती है।

यह बीमारी अधिकांशत: लडक़ों में होती है। जन्म लेने वाले ३५०० बच्चों में से एक बच्चा इस रोग का शिकार हो जाता है। प्रत्येक वर्ष डीएमडी के २० हजार नए मामले सामने आते है। शुरुआत में अभिभावकों को पता नहीं चल पाता कि उनके बच्चे को यह गंभीर रोग है। डीएमडी बीमारी का कोई इलाज नहीं है। रोगी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बीमारी को नियंत्रित भर किया जा सकता है। साथ ही नियमित रूप से व्यायाम और योग इसके लिए मददगार है।

उन्होंने बताया कि वेंकटरमण का इलाज जब शुरू किया तब उसकी हालत बेहद नाजुक थी। स्टेम सेल थैरेपी के प्रत्येक डोज के बाद वेंकटरमण का वजन बढऩे के साथ-साथ वह ऊर्जावान होने लगा। पहले वह सिकुड़ा हुआ था अब वह व्हीलचेयर पर बैठने में सक्षम है।

नौंवें महीने में दिखे लक्षण

वेंकटरमण की मां ने बताया कि अगस्त १९९६ में वह नौ महीने का था। उसी समय वेंकट को बेहोशी और ऐंठन की परेशानी होने लगी। उसके बाद शरीर में कई तरह के विकार पैदा हो गए। कई चिकित्सकों से परामर्श लिया लेकिन मर्ज का इलाज नहीं हुआ। फिर जब इंटरनेट पर सर्च किया तो पता चला कि वेंकट डीएमडी की चपेट में है जिसका कोई इलाज नहीं है। उसके बाद वह बीमारी का इलाज ढूंढने लगी। उसने मंदिरों में पूजा और हवन कराया।

पंडितों और ज्योतिषियों से मशविरा किया। उसके बाद एलोपैथिक, आयुर्वेदिक केरल पंचकर्म मालिश से लेकर सब कुछ किया लेकिन सभी प्रयास विफल रहे। फिर उसे न्यूरोजेन अस्पताल के बारे में पता चला और उसने वहां के चिकित्सकों से २०११ से परामर्श लेना शुरू किया। अब उनको जीन थैरेपी का इंतजार है जिसके बाद संभवत: वेंकटरमण अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा।

मुकेश शर्मा Reporting
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