लोभ का दानव मिटे बिना मानव बनना असंभव

पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा यदि आप गलत जगह या स्थान पर गलत बात अच्छी भावना से भी बोलेंगे तो परिणाम गलत ही आएंगे। जहां जो नहीं बोलना चाहिए वहां हम बोल जाते हैं, गलत जगह पर वस्तु रख देते हैं। उसके परिणाम गलत आते हैं, वहां अच्छी भावना भी काम आने वाली नहीं है।

By: मुकेश शर्मा

Published: 15 Nov 2018, 11:47 PM IST

चेन्नई।पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा यदि आप गलत जगह या स्थान पर गलत बात अच्छी भावना से भी बोलेंगे तो परिणाम गलत ही आएंगे। जहां जो नहीं बोलना चाहिए वहां हम बोल जाते हैं, गलत जगह पर वस्तु रख देते हैं। उसके परिणाम गलत आते हैं, वहां अच्छी भावना भी काम आने वाली नहीं है।

इस प्रकार अच्छी भावना से भी विराधना हो जाती है। इसलिए यथास्थान, यथाभाव से वस्तु रहनी चाहिए। वस्तुओं के उपयोग में आपको उसके परिणामों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। जो आपने किया वही परिणाम मिलेंगे। इसलिए परमात्मा ने चौथी समिति यह दी है कि बिना दुर्भावना के, बिना कषाय के कैसे जीवन में पाप शुरू हो जाते हैं। इसका पालन करने से याददाश्त बहुत तीव्र हो जाती है। इसे जितना समझेंगे उतना जीवन विराधना से मुक्त हो जाएगा।

जो वस्तु जो व्यक्ति संभाल नहीं सकता वह उसे दे दिया जाए या गलत आदमी गलत जगह पर बैठ जाने से सभी उसके परिणाम भुगतते हैं। धृतराष्ट्र को अयोग्य होने पर भी सत्ता मिल गई तो कितने ही लोगों की जिंदगी खतरे में आ गई। इसे अच्छी तरह से समझें, सही व्यक्ति, वस्तु या शब्दों का सही जगह चुनाव करें। किसी से उसके प्राणाधार या आस्था कभी भी छीनें नहीं। किसी के प्राणों के आधार को छीन लेना विराधना का मार्ग है।

आचारांग सूत्र में बताया है कि कैसे अन्दर के लोभ को जीतना चाहिए। जब तक अन्दर लोभ का दानव मरता नहीं है, तब तक साधक बनने की बात तो दूर, व्यक्ति मानव बन ही नहीं पाता है। यदि कोई साधक लोभ को छोडक़र चलता है लेकिन अगर कुछ मिल जाए तो उसे ग्रहण कर लेता है, उसके लिए परमात्मा कहते हैं कि वह आज्ञा के बाहर हो गया और आत्मा की प्रतिलेखना करने के बजाय विषयों की प्रतिलेखना करने लगा गया है। संत का बाना हो और चरित्र महंत का हो जाए तो खतरनाक है, वह व्यक्ति स्वयं के साथ न जाने कितनों को ही डुबो देता है।

दीक्षार्थी के लिए संयम उस समय दु:ख की शय्या बन जाती है जब यह लगे कि दीक्षा लेकर गलती की। जो अपना लक्ष्य ध्यान में रखकर निर्णय लेते हैं वे ही सफल होते हैं, अवसर देखकर निर्णय लेने वाले को मौके कब धोखा दे दे पता नहीं। जैसी प्रतिज्ञा आपने की है, वैसा ही निर्णय लिया करें।

तीर्थेशऋषि ने कहा जो व्यक्ति संतों और सज्जनों की संगत नहीं करता उसके जीव में पान पाप तो आना ही है, कुछ जीवों को सब कुछ मिलने के बाद भी समझ नहीं आती है। अपने जीवन कल्याण की भावना नहीं होती और पाप उपार्जन करता रहता है।

मर्यादा में रहते हुए भी संसार को नहीं छोड़ पाते। अन्य क्षेत्र में किया हुआ पाप छूट जाता है लेकिन धर्मक्षेत्र में किया हुआ पाप वज्रलेप जैसा बन जाता है इसलिए जो पुण्यकर्मों से मिला है उसे और बढ़ाते जाएं, धर्म को बढ़ाने की भावना की तरह धर्म को भी बढ़ाने के नित नए रास्तों की खोज करनी ही चाहिए। धर्म में भी नूतनता होनी चाहिए, धर्म को तरह-तरह से बढ़ाना चाहिए।

मुकेश शर्मा Reporting
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