पूर्व छात्रा को 6.12 लाख का मुआवजा देने का निर्देश

बिना उचित मान्यता के पाठ्यक्रम में प्रवेश देने को महानगर के डॉ. एमजीआर डीम्ड विश्वविद्यालय की कमी मानते हुए उससे मुआवजे के तौर पर बी. आर्च की एक पूर्व छात्रा को 6.12 लाख रुपए देने के लिए कहा गया है।

By: Santosh Tiwari

Published: 19 Jan 2019, 12:46 PM IST

चेन्नई. बिना उचित मान्यता के पाठ्यक्रम में प्रवेश देने को महानगर के डॉ. एमजीआर डीम्ड विश्वविद्यालय की कमी मानते हुए उससे मुआवजे के तौर पर बी. आर्च की एक पूर्व छात्रा को 6.12 लाख रुपए देने के लिए कहा गया है। इम मामले में सुनवाई करते हुए तमिलनाडु राज्य उपभोक्ता आयोग की सदस्य एस.एम. लता माहेश्वरी एवं पीठासीन सदस्य के. भास्करन ने चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता रेशमी दिवाकरण को शुल्क के 87500 रुपए, मानसिक यातना के लिए 5 लाख रुपए तथा अन्य खर्चे के लिए 25 हजार रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया। दिवाकरण के मुताबिक विश्वविद्यालय द्वारा जारी बी.आर्च पाठ्यक्रम के अपेक्षित अनुमोदन वाले प्रॉस्पेक्टस पर आकर्षित होकर याचीकर्ता ने जून 2005 में 56600 रुपए ट्यूशन फीस का भुगतान तो कर दिया लेकिन जब वह पढ़ाई करने के लिए कक्षा में गई तो कमरे की दुर्दशा एवं अनियमित कक्षाओं का संचालन देखकर दंग रह गई।
अपनी याचिका में उसने बताया कि इसके अलावा कॉलेज की बसों का संचालन भी नियमित रूप से नहीं होता था। हालांकि इन सभी असुविधाओं एवं अनियमितताओं के बावजूद भी याचीकर्ता ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। इसके बाद मानसून के दौरान बाढ़ आने से कॉलेज परिसर में पानी भर गया और उसे अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया। बाढ़ समाप्त होने के बाद सरकार ने अवैध निर्माण के लिए संस्था के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कॉलेज के कुछ भाग को गिराने का आदेश दे दिया। इसके अलावा बिना उचित अनुमोदन के पाठ्यक्रम संचालित करने के मामले में भी उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई। याचीकर्ता ने बताया कि इतना सब कुछ होने के बाद भी उसे 30 हजार रुपए समेस्टर फीस भरने के लिए मजबूर किया गया। लेकिन इन सब के बावजूद भी जब कॉलेज सब कुछ ठीक करने में असफल रहा तो 2006 में उसने कॉलेज छोडक़र दूसरे कॉलेज में दाखिला लेने का फैसला किया। इसके बाद से ही उसने जमा शुल्क वापस करने तथा मानसिक यातना के मुआवजे के भुगतान के लिए कानूनी नोटिस भेजना शुरू कर दिया। हालांकि इस मामले सभी आरोपों से इनकार करते हुए संस्थान ने कहा कि यहां सेवा में कमी का प्रश्न ही नहीं किया जा सकता क्योंकि विद्यार्थी और महाविद्यालय के बीच सेवा प्रदाता और उपभोक्ता का संबंध नहीं है। लेकिन इस तर्क को दरकिनार करते हुए आयोग ने संस्थान को याचीकर्ता को कुल 6.12 लाख रुपए मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया।

Santosh Tiwari
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