नया साल, नया दिन, नयी तमन्ना जीवन की...

- अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच, तमिलनाडु इकाई की दिसंबर माह की गोष्ठी

By: Santosh Tiwari

Published: 28 Dec 2020, 10:26 PM IST

चेन्नई.

अंतर्राष्ट्रीय महिला काव्य मंच, तमिलनाडु इकाई की दिसंबर माह की गोष्ठी डॉ सुमनलता रुद्रवझला की अध्यक्षता में सफलतापूर्वक संपन्न हुई। गोष्ठी का प्रारम्भ रेखा राय के स्वागत भाषण से हुआ। डॉ मंजु रुस्तगी की सरस्वती वंदना के पश्चात सभी कवयित्रियों ने एक से बढ़ कर एक प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का आग़ाज़ सीमा प्रताप ने ईश्वर को पुकार कर किया- ‘जब भी पुकारु मेरे भगवन तुम्हें आना ही होगा। रेखा राय ने भी उसी तर्ज़ पर ‘परमात्मा न पाया, पाया जनम तो क्या हुआ’ गीत सुनाया। ऊषा टिबरेवाल ने ‘दोस्तों का प्यार यूं ही उधार रहने दो’ और अनीता सोनी ने ‘आज वक्त से फिर मुलाक़ात हो गयी’ सुना कर समां बांध दिया। जहां मिथिलेश सिंह ने नववर्ष के स्वागत में ‘नया साल, नया दिन, नयी तमन्ना जीवन की’ पढ़ी,वहीं पमिता खिचा ने बीते वर्ष पर सरसरी निगाह डालते हुए ‘यदि परिस्थिति न बदल सकें तो मनोस्थिति को बदलें हम’ की प्रेरणा दी। रेखा चौहान ने समसामयिक विषय पर कविता कही-‘कब सोचा था लोगों का पेट भरने वाला क्या परिवार का पेट भर पायेगा?’ वहीं सुरभि दत्त ने ‘खलिहान’ कविता में ‘रंग में भंग’ डाल रहे विरोधियों को आड़े हाथों लिया। सरिता सरगम ने ‘इस देश का विकास दुनिया देख रही है’ सुना कर देश भक्तों का उत्साह बढ़ाया। नारी शक्ति का आह्वान करते हुए डा मंजु रुस्तगी ने कविता पढी- ‘अब न बनूँ पत्थर की मूरत, हलाहल न पियूँगी मैं’. इसी संकल्प को दृढ़ करते हुए कंचन सेठिया ने अपनी कविता ‘अनगिन समर लड़ रही हूँ मैं, अभी गीत न गाऊँगी’ से गोष्ठी में चार चाँद लगा दिए। कंचन अपराजिता ने हाइकु और क्षणिकाएं सुनाने के साथ प्रेम रस में सराबोर ‘साथ तुम्हारा ऐसे जैसे बिन मौसम के फ़ूल खिले’ कविता गुनगुनाई। अल्पना सिंह ने ‘प्यार नहीं प्रेम हो गया है मुझे’ सुना कर प्रेम और प्यार का अंतर बतलाया। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मोहिनी चोरडिया ने प्रेम के प्रतीक ‘ताजमहल’ को एक अलग अंदाज़ में पेश किया। नीलू शर्मा ने प्रथम प्यार की अभिव्यक्ति कुछ इस तरह की ‘वो प्रेम क्या जो शब्दों का मोहताज हो’। नलिनी शर्मा ने भ्रूण हत्या जैसे अपराध को कुछ इस तरह प्रस्तुत किया-‘कोमल कली पुकार रही, क्यूं तुम मुझे मार रहे’। दहेज प्रथा जैसी कुरीति को भारती रंजन ने बहुत मार्मिक ढंग से पेश किया ‘पापा, जब मुझे जलाया गया’। शोभा चोरड़िया की ग़ज़ल ‘उजले उजले राहों में तो कई क़समें खाते हैं, अंधियारे घिरने पर देखें कितना साथ निभाते हैं’ ने सबका मन मोह लिया। रविता भाटिया ने ‘दुःख बांटने से घटते हैं’ .. इस परम्परागत पंक्ति को अपनी कविता ‘हमने बांट कर जख्म पर मरहम लगाया तो परिणाम उल्टा ही पाया’ से विपरीत दिशा दे दी। दिव्या ने अपनी कविता ‘न्याय’ से न्याय प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। संचालिका शोभा चौरड़िया का संचालन अभूतपूर्व रहा। अंत में अध्यक्ष सुमनलता ने हर कविता की बारीकी से समीक्षा की और हर कवियित्री का मान बढ़ाया। उनकी कविता ‘मिट्टी की महक से दूर होते जा रहे हम’ ने सबके दिलों में सोंधी सी खुशबू बिखेर दी। रेखा राय ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

Santosh Tiwari Desk
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